नई दिल्ली। आर्थिक सुधारों पर कड़ा फैसला सियासी संग्राम की वजह बन गया है। यूपीए सरकार की सबसे बड़ी सहयोगी ममता बनर्जी और कांग्रेस के बीच तलवारें खिंच गई हैं। ममता ने सरकार को फैसले वापस लेने के लिए 72 घंटे का अल्टीमेटम दे दिया है। ममता एफडीआई और डीजल-रसोई गैस की बढ़ी कीमतें-दोनों के खिलाफ हैं। इधर सरकार की ओर से खुद प्रधानमंत्री ने कमान संभाल ली है। प्रधानमंत्री ने साफ कर दिया है कि फैसले वापस नहीं लिए जाएंगे। जाना ही पड़ा तो लड़ते-लड़ते जाएंगे। वहीं गौरतलब है कि योजना आयोग की बैठक में पीएम सुबह 10.30 बजे शामिल होंगे
डीजल और रसोई गैस के दाम बढ़ाने के 24 घंटों के भीतर ही विदेशी निवेश को हरी झंडी देकर सरकार ने दिखा दिया है कि वो करो या मरो मोड में आ गई है। सरकार को विपक्ष के साथ-साथ ममता और मुलायम जैसे सहयोगियों के विरोध का भी अंदाजा था। लेकिन अनुमान से ज्यादा सख्त तेवर के साथ सामने आई ममता ने फेसबुक पर लिखा कि हम डीजल की कीमत में इजाफा और एलपीजी पर सरकार के फैसले का समर्थन नहीं कर सकते। आज सरकार ने रिटेल में एफडीआई का फैसला कर लिया। ये बहुत बड़ा झटका है। मुझे खेद है लेकिन हम ऐसे फैसले का समर्थन नहीं कर सकते। ये गरीबों और आम आदमी के खिलाफ है। लूट चल रही है लूट।

जाहिर है ममता की ये चुनौती बड़ी है। लोकसभा में सरकार को तृणमूल के 19 सांसदों का समर्थन है। ममता का साथ छूटने की हालत में उसे मुलायम के 22 सांसदों का थोड़ा भरोसा था। कुछ नाजुक मौकों पर मुलायम ने साथ दिया भी। लेकिन इस बार वो भी सरकार के फैसलों के पक्ष में नहीं दिख रहे। इसकी एक वजह तो यही है कि उनकी पार्टी को कांग्रेस के खिलाफ लोकसभा चुनाव भी लड़ना है।
अहम सहयोगियों की इस मुखालफत के बाद भी सरकार ने रिस्क लिया है। इसके पीछे शायद ममता का इतिहास है। राष्ट्रपति चुनाव और पेट्रोल की कीमतों पर वो पहले भी पलट चुकी है। मुलायम भी किसी बड़े फायदे के बगैर फिलहाल कांग्रेस से ज्यादा दूरी नहीं बनाएंगे। और अगर ऐसा हुआ भी तो समर्थन वापसी की हालत में सरकार गंवाने की नौबत आई तो भी जाएंगे शहीद की तरह। प्रधानमंत्री के इस बयान का मतलब यही है कि बड़े आर्थिक कदम उठाने का वक्त है। अगर जाना होगा, तो लड़ते हुए जाएंगे।
जाहिर है मनमोहन के बयान ने सहयोगी पार्टियों को साफ संदेश दे दिया है। आर्थिक सुधारों पर संग्राम से पीछे नहीं हटेंगे। दरअसल कांग्रेस के लिए आर्थिक सुधारों को राजनीतिक एजेंडे पर लाना भी मजबूरी है। अगर अर्थव्यवस्था पटरी पर आने लगी तो वो राजनीतिक तौर पर वो वापस खड़ी हो जाएगी और विपक्ष भी भ्रष्टाचार के आरोपों का फायदा नहीं उठा पाएगा।
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