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मूवी रिव्यू: अपने नाम की तरह ही स्वीट है रणबीर की बर्फी

| Sep 15, 2012 at 04:10pm | Updated Sep 15, 2012 at 04:55pm

मुंबई। वो चंद फिल्में जो अपने पहले फ्रेम से ही आपके चेहरे पर मुस्कान ले आएं उन्हीं में से एक है अनुराग बसु की ‘बर्फी’। यहां तक कि रुटीन इक्नोलेजमेंट के साथ जब ब्लैक स्क्रीन पर लिखा आता है ‘पिक्चर शुरू’ वो भी आपके दिलों को जीत लेगा। बर्फी में बहुत कुछ है जो तारीफ के काबिल है। खास तौर पर इसके किरदारों की सादगी। ये फिल्म कुछ सीधे लोगों के बारे में है जो मुश्किलों का सामना करते हैं। इस फिल्म में कोई विलेन नहीं है। बस ईमानदार लोग हैं जो अक्सर गलत फैसले ले लेते हैं, पर अफसोस डायरेक्टर अनुराग बसु भी कुछ ऐसा ही करते हैं। मानो वो इस सिंपल सी कहानी से बहुत खुश नहीं थे इसलिए उन्होंने बेमतलब के सबप्लॉट्स और कंन्फ्यूजिंग टाइमलाइंस से इसे जटिल बना दिया है।

1970 में सेट रणबीर कपूर मर्फी या जैसे वो खुद कहता है बर्फी के किरदार में हैं जो एक गरीब ड्राइवर का बेटा है। वो दार्जिलिंग में रहने वाला एक ऐसा लड़का है जो न बोल पाता है और न ही सुन पाता है। वो हर बार अपनी बदमाशियों की वजह से एक मोटे पुलिसवाले से भागता रहता है। बर्फी को प्यार हो जाता है बेहद खूबसूरत श्रुति यानी इलियाना डी क्रूज से जिसे वो लगातार खुश करने की कोशिश करता है पर एक सीन में श्रुति को अहसास होता है कि उनके प्यार के हैप्पी एंडिंग नहीं हो सकती। ये सीन सीधे ‘द नोटबुक’ से उठाया गया है। बाद में फिल्म के एक सबसे बेहतरीन सीन में बर्फी बिना बोले अपने और श्रुति के बीच के फासले को दिखाता है।

फिर उसकी जिंदगी को नया प्यार मिलता है जब वो अपनी बचपन की दोस्त झिलमिल यानी प्रियंका चोपड़ा से मिलता है। ये फिल्म एक लव स्टोरी के तौर पर सबसे अच्छा काम करती है। बसु अपने तीन प्रमुख किरदारों के रिश्तों के बीच ह्यूमर और जान डालते हैं। बर्फी में छोटे-छोटे बहुत प्यारे मोमेंट्स हैं, जैसे कि वो जिसमें हमारा हीरो बार-बार अपना दिल निकाल कर श्रुति के सामने रखता है। फिर भी ये खूबसूरत सी फील्म कहीं न कहीं मार खाती है। इसके फ्लैशबैक से भरे मैसी स्क्रीनप्ले और लंबे खींचे गए सेकेंड हॉफ की वजह से।

फिल्म का टोन अब अचानक से जेंटल ह्यूमर और रोमांस से अटपटे सस्पेंस की तरफ मुड़ जाता है। इसकी कमियों के बावजूद फिल्म के पीछे के स्किल्स और इसमें लगी मेहनत को अनदेखा नहीं किया जा सकता है जिसकी शुरुआत होती है रवि वर्मन की शानदार सिनेमेटोग्राफी से। फिल्म में दार्जिलिंग और कोलकाता के लैंडस्केप्स को बहुत प्यार से कैप्चर किया गाया है। प्रीतम का म्यूजिक (जो उनके अभी तक के सबसे बेहतरीन कामों में एक गिना जा सकता है) इसके डायलॉग की कमियों को पूरा कर देता है। बसु खासतौर पर इसके टाइटल सॉन्ग ‘आला बर्फी’ को बेहद ओरिजनेलटी के साथ फिल्माते हैं।

इलियाना अपनी इस हिंदी डेब्यू में अपने शानदार आत्मविश्वास और अपनी बड़ी-बड़ी आंखों से अपनी गहरी छाप छोड़ती हैं। ऑटिस्टिक किरदार की मुश्किलों को पार करते हुए प्रियंका चोपड़ा झिलमिल को एक ऐसा किरदार बनाती हैं जो अपके दिलों को छू लेगा। पर फिर भी फिल्म पूरी तरह से जाती है हमारे साइलेंट हीरो रणबीर कपूर को जो अपने किरदार में मानो खो जाते हैं। बसु की ये फिल्म परफेक्ट नहीं है और खुद को बहुत लंबा खींचती है पर बर्फी में वो पाथ ब्रेकिंग सिनेमा वाली बात है क्योंकि ये और फिल्मों से कहीं ज्यादा सम्मानजनक है। मैं अनुराग बसु की बर्फी को पांच में से तीन स्टार देता हूं। ये फिल्म अपने नाम की तरह ही स्वीट और कंफर्टिंग है।

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