नई दिल्ली। एक दिन पहले एफडीआई के मुद्दे पर सरकार के खिलाफ बाकी विपक्ष के साथ आग उगलने वाले मुलायम सिंह यादव मान कैसे गए। मुलायम जरूर सांप्रदायिक ताकतों को रोकने का बहाना बना रहे हैं लेकिन कहानी कुछ और है।
दरअसल मंगलवार को जब टीएमसी संसदीय दल की बैठक हो रही थी, तब सोनिया गांधी के राजनीतिक सलाहकार अहमद पटेल ने एसपी के महासचिव रामगोपाल यादव से फोन पर बात की। इसके बाद मुलायम सिंह यादव रामपुर का दौरा बीच में छोड़कर दिल्ली पहुंचे। दिल्ली पहुंचकर मुलायम और अहमद पटेल के बीच फोन पर बातचीत हुई।

मुलायम ने कहा कि समाजवादी पार्टी रिटेल में एफडीआई, डीजल के बढ़े दाम और एलपीजी सिलेंडर के कोटे पर सरकार के फैसले के खिलाफ है। इसके बाद सरकार ने मुलायम को मैनेज करने के लिए गोटियां बिछानी शुरू कर दीं। सरकार ने कहा कि मुलायम सिंह यूपी में रिटेल में एफडीआई लागू करने या नहीं करने के लिए स्वतंत्र हैं। साथ ही मुलायम को भरोसा दिलाया गया कि सरकार डीजल के दाम कम करने और एलपीजी सिलेंडरों का कोटा बढ़ाने को लेकर विचार कर रही है।
यही नहीं, सरकार के क्राइसिस मैनेजरों ने मुलायम को ये भी यकीन दिलाया कि ये सब ममता के दबाव में नहीं बल्कि मुलायम को साथ रखने के लिए किया जा रहा है। उधर मुलायम के करीबियों ने उन्हें समझाया कि समाजवादी पार्टी के समर्थन वापस लेने के बाद भी सरकार अल्पमत में नहीं आएगी। ऐसे में मायावती सरकार को समर्थन देकर अपना कद बढ़ा सकती हैं।
जाहिर है मुलायम मायावती को बढ़त लेने का कोई मौका नहीं देना चाहते। हालांकि सरकार को भी पता है कि मायावती समर्थन वापस लेकर मुलायम को मजबूत नहीं होने देना चाहेंगी। तेलंगाना पर बड़ी घोषणा की तैयारी हो चुकी है यानी टीआरएस के दोनों सांसदों का समर्थन मिलना तय हो गया है। ये आत्मविश्वास सरकार के मंत्रियों के अंदाज से साफ झलक रहा था।
यानी मायावती और मुलायम की राजनीतिक मजबूरियों को कांग्रेस ने अपनी ताकत बना ली है। मुलायम ने 2008 का इतिहास एक बार फिर दोहरा दिया जब उन्होंने परमाणु करार पर गिरने को आई मनमोहन सरकार की मदद की थी। लेकिन इससे तीसरे मोर्चे के जरिए प्रधानमंत्री बनने के उनके मंसूबे पर ग्रहण लग सकता है। कांग्रेस विरोध की उनकी मुद्रा एक बार फिर साख के संकट से गुजर रही है।
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