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क्या वोट के लिए काफी नहीं मोदी की उपलब्धियां?

| Oct 03, 2012 at 09:15pm | Updated Oct 03, 2012 at 10:20pm

नई दिल्ली। बुधवार को गुजरात में चुनाव की तारीख का ऐलान हो गया। लगातार तीसरी बार मुख्यमंत्री बनने को बेकरार नरेंद्र मोदी कमर कस कर मैदान में उतर पड़े हैं, लेकिन दांव उन्होंने पुराना ही चला है। विकास का दम भरने वाले नरेंद्र मोदी अब चुनाव को मोदी बनाम सोनिया गांधी की शक्ल देने की कोशिश में हैं। वो चाह रहे हैं कि चुनाव उनके इर्दगिर्द सिमट कर रह जाए और इसीलिए उन्होंने सोनिया गांधी पर निजी हमले करने भी शुरू कर दिए हैं। ऐसे में सवाल ये कि क्या मोदी को अपनी उपलब्धियों पर भरोसा नहीं रह गया है।

सत्ता में रहते सिर्फ विकास की बात, लेकिन चुनाव करीब हों तो भावनात्मक मुद्दे की तलाश-यही है नरेंद्र मोदी का चुनावी मंत्र। बतौर मुख्यमंत्री हैट्रिक मारने की कोशिश में जुटे मोदी को भरोसा है कि उनका मंत्र फिर कारगर होगा। उन्हें अच्छी तरह याद है कि 2002 में अटल बिहारी वाजपेयी के राजधर्म की सीख को उन्होंने अनसुना किया और भावनाओं के उबाल को वोटों की बारिश में बदल दिया। 2007 में सोनिया के मौत के सौदागर वाले बयान को गुजरात की अस्मिता का सवाल बनाकर वोटों की फसल काटी।

2012 में भी वही रंग दिख रहा है। जिस तरह मोदी पिछले कुछ दिनों से सोनिया पर निजी हमले कर रहे हैं, वो बताता है कि तैयारी हो चुकी है। हालांकि जब चुनाव आय़ोग ने 13 और 17 दिसंबर को चुनाव कराने की घोषणा की, तो मोदी ने इसका स्वागत करते हुए ट्विटर पर लिखा कि चुनाव लोकतंत्र का सबसे बड़ा त्योहार है। हम इसी भाव से चुनाव में हिस्सा लेंगे।

सवाल ये कि मोदी वाकई उत्सव का गुलाल लगाना चाहते हैं तो फिर मलाल वाली बातें क्यों करते हैं? वे चुनाव को मोदी बनाम सोनिया क्यों बनाना चाहते हैं। उन्होंने खुद अपनी यात्राओं पर हुए खर्च का ब्योरा नहीं दिया, लेकिन एक अपुष्ट खबर के सहारे आरोप लगा दिया कि सोनिया गांधी के विदेश दौरों पर 1880 करोड़ रुपये खर्च हुए हैं। कांग्रेस नेतृत्व इस चाल को समझ रहा है इसलिए बुधवार को राजकोट में रैली करने पहुंचीं सोनिया ने निजी हमले का कोई जवाब नहीं दिया। लेकिन कांग्रेस के एक महासचिव मोदी की चाल के शिकार हो ही गए। बीके हरिप्रसाद ने नरेंद्र मोदी पर बयान दिया कि उन्हें पूरी दुनिया में हत्यारा के नाम से जाना जाता है। इससे उसकी मानसिकता दिख रही है।

इस बयान से सबसे ज्यादा खुश मोदी ही होंगे क्योंकि जब सोनिया गांधी गुजरात में लोकायुक्त न होने, वैट की दरें ज्यादा होने, किसानों की खुदकुशी या फिर सौराष्ट्र में पानी के अभाव से मची त्राहि-त्राहि जैसे सवाल उठाती हैं तो मोदी का शासन कसौटी पर होता है। जबकि हत्यारा, दंगा, हिंदू-मुस्लिम जैसे शब्दों से भरे बयानों को मोदी अपनी राजनीति का ईंधन समझते हैं। अब उनसे ये सवाल कौन पूछे कि खुद को प्रधानमंत्री की कुर्सी का दावेदार मानने वाला नेता भावनाओं पर इस कदर निर्भर क्यों है? क्या उन्हें भरोसा नहीं कि गुजरात की जनता विकास के उनके दावों पर मुहर लगाएगी?

(चुनाव मुद्दों पर लड़े जाने चाहिए न कि किसी की निजी छवि पर। आईबीएन7 के खास कार्यक्रम एजेंडा में इस मुद्दे पर चर्चा के लिए मौजूद थे भारतीय जनता पार्टी के मुख्य प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद, कांग्रेस नेता और केंद्रीय संसदीय राज्यमंत्री हरीश रावत, वरिष्ठ पत्रकार प्रभु चावला और गुजरात के सबसे बड़े अखबार दिव्य भास्कर के संपादक अवनीश जैन। एंकरिंग आशुतोष ने की। वीडियो देखें)

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