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दिल्ली नहीं पहुंचे लेकिन सत्ता हिला दी सत्याग्रहियों ने

| Oct 09, 2012 at 09:45am | Updated Oct 09, 2012 at 10:48am

नई दिल्ली। गरीबों, भूमिहीनों, किसानों, आदिवासियों की नायाब भीड़ का नायाब मार्च दिल्ली की तरफ बढ़ रहा है। 10 से 12 किलोमीटर लंबा या कारवां अभी दिल्ली से दूर है लेकिन यहीं से का ये मार्च सत्ता की चूलें हिला रहा है। 26 राज्यों के 50 हजार लोगों की ये भीड़ जमीन लांघते हुए दिल्ली की तरफ कूच कर रही है।

ये वो भूमिहीन आदिवासी हैं जिनके आंसू आजादी के 65 बरस बाद भी किसी ने नहीं पोंछे। न एक अदद छत है, न अनाज का आसरा, न बच्चों के कल की कोई सुरक्षा। गांधी जयंती को ग्वालियर से निकला ये अहिंसक कारवां मुरैना से होते हुए राजस्थान में दाखिल होकर धौलपुर पहुंचा, फिर वहां से उत्तर प्रदेश के बरेठा में दाखिल हुआ, अब अगला पड़ाव आगरा है, फिर मथुरा और पलवल के रास्ते दिल्ली।

सत्याग्रही बीच-बीच में ढोल मृदंग की थाप पर नाचते-गाते हैं। इन गानों में उनके आंदोलन का नाम जुड़ा होता है। ये रैली एकता परिषद के बैनर तले इस दफा आर-या-पार की लड़ाई के लिए दिल्ली की ओर बढ़ रही है। इनका नारा साफ है, मारेंगे नहीं पर मानेंगे भी नहीं। पिछले तीन हफ्ते से इन जुनूनी लोगों का आशियाना यही धरती है, ये सड़क है। आगरा मुंबई हाइवे ही जैसे घर बन चुका है। यह सत्याग्रही रोज करीब 18 किलोमीटर पैदल चलते हैं। बीच-बीच में जहां कदम जवाब दे देते हैं, रुकते हैं सुस्ताते हैं और सूरज उगते ही पांव चलने लगते हैं और सूरज डूबते ही खुले आसमान के नीचे सड़क पर ही बिस्तर लग जाता है।

पौ फटते ही फिर शुरू हो जाती है इनकी तैयारी, नींद और थकान भगाने के लिए दिन की शुरुआत होती है काली चाय के प्याले से। आईबीएन 7 की टीम सुबह-सुबह मध्य प्रदेश के टीकमगढ़ से आये सहारिया आदिवासियों के टोले में पहुंची। सत्याग्रह में जुड़ने की उनसे वजह पूछी। सत्याग्रही जगदीश ने बताया कि हमारे पास न पीने के लिए पानी है न कुआं है। कहां तक मजदूरी करें। आठ दस बच्चे परिवार में हैं क्या करें?

सुबह जब सफर शुरू होता है तो जहां तक नजरें जाएं सिर ही सिर नजर आते हैं। भीड़ हज़ारों में है लेकिन अनुशासन देखने लायक। ये जानते हैं कि संसद का रास्ता सड़कों से ही होकर गुजरता है और ये संघर्ष आसान नहीं। पैरों में छाले पड़ेंगे, निगाहें पथराएंगी लेकिन कदम मंजिल तक पहुंच कर रहेंगे।

दरअसल इनकी लंबे समय से मांग है कि राष्ट्रीय भूमि सुधार नीति बने, हर बेघर आदिवासी को घर के लिए जमीन मिले, खाली जमीन के बारे में लैंड पूल बने, आदिवासी इलाकों के लिए कानून सख्ती से लागू हों और इन इलाकों में जमीन विवाद के निपटारे के लिए विशेष अदालतें बनाई जाएं।

एकता परिषद अध्यक्ष राजगोपाल पी वी ने कहा कि गवर्नेंस सिर्फ मल्टीनेशनल कंपनियों के लिए नहीं है। गवर्नेंस गरीब लोगों की जल जंगल जमीन की समस्या के निदान के लिए भी है।

ये जमीन से जुड़ा आदिवासियों का आंदोलन है। सरकार एकता परिषद की आदिवासियों को जल जंगल और जमीन का हक देने की मांग से इत्तेफाक रखती है लेकिन आजादी के 65 साल बाद भी इन्हें अधिकार क्यों नहीं मिल पाया। इसका उसके पास कोई जवाब नहीं।

अब हजारों आदिवासियों के दिल्ली मार्च से बौखलाई सरकार उनसे बात कर रही है। ये बातचीत मंगलवार को भी जारी रहेगी।

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