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गडकरी के दोबारा अध्यक्ष बनने पर भी लटकी तलवार

| Oct 23, 2012 at 03:39pm

नई दिल्ली। बीजेपी अध्यक्ष नितिन गडकरी आरोपों के घेरे में क्या आए, अध्यक्ष के रूप में उनके दूसरे कार्यकाल पर भी तलवार लटक गई है। सूत्रों के मुताबिक अगर गडकरी की कंपनी में घालमेल का मामला साबित होता दिखा तो उनका बना-बनाया खेल बिगड़ सकता है। इस पूरे खेल में संघ भी बैकफुट पर है जिसने गडकरी को अपनी पसंद की तौर पर आगे बढ़ाया है।

अरविंद केजरीवाल की प्रेस कान्फ्रेंस के बाद चैन की सांस ले रहे नितिन गडकरी को पूरा भरोसा था कि उनको अब लगातार दूसरी बार बीजेपी का अध्यक्ष बनने से कोई रोक नहीं सकता। लेकिन उनकी कंपनी में हुए घालमेल के सबूतों ने उनका सिरदर्द एक बार फिर बढ़ा दिया है। पार्टी ही नहीं संघ के अंदर भी निगाहें इस बात पर टिक गई हैं कि ये मामला कितना उछलता है और गडकरी इनमें किस हद तक फंसे दिखते हैं। हालांकि कैमरे पर कोई भी इसे जाहिर होने देना नहीं चाहता।

वैसे नितिन गडकरी के बने रहने में जिन्हें दिक्कत हो सकती है। उनमें पहला नाम नरेंद्र मोदी का है। मोदी कांग्रेस और यूपीए के भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाकर गुजरात का चुनाव जीतना चाहते हैं। ऐसे में गडकरी के खिलाफ भ्रष्टाचार का मामला उनका खेल बिगाड़ सकता है। वैसे ही हिमाचल में प्रेम कुमार धूमल भी वीरभद्र सिंह के खिलाफ राशन-पानी लेकर पीछे पड़े हैं। शिमला में भ्रष्टाचार के खिलाफ हल्ला और दिल्ली में अपने अध्यक्ष का बचाव साथ-साथ नहीं चल सकता। सूत्र बताते हैं कि मोदी को पीएम बनाने की सार्वजनिक तौर पर मांग उठा चुके पार्टी सांसद और वरिष्ठ वकील राम जेठमलानी का गडकरी से इस्तीफा मांगना अकारण नहीं है।

भ्रष्टाचार का मामला तो सतह पर है लेकिन असली बात कुछ और है। बीजेपी के बड़े नेताओं को एक मौका मिल गया है कि वो भ्रष्टाचार को धुरी बनाकर गडकरी पर सीधा हमला करना चाहते हैं। गडकरी संघ के चहेते हैं और ऐसे नेताओं के पास एक अवसर है कि वो गडकरी के बहाने संघ की पसंद पर सवाल उठा सकें। लालकृष्ण आडवाणी और सुषमा स्वराज जैसे दिग्गज गडकरी को दूसरा कार्यकाल देने के पक्ष में नहीं थे लेकिन संघ के दबाव में उन्होंने हां कर दी थी। अब उनका केस मजबूत होगा और संघ का कमजोर। वैसे पार्टी औपचारिक तौर पर भ्रष्टाचार और गडकरी के दूसरे कार्यकाल को जोड़कर देखना नहीं चाहती। पार्टी प्रवक्ता निर्मला सीतारमन कहती हैं कि दोनों के बीच कोई कनेक्शन नहीं दिखता।

दरअसल संघ ने अरविंद केजरीवाल की बहुचर्चित प्रेस कान्फ्रेंस के पहले भी एक प्लान-बी तैयार कर लिया था। माना जा रहा है कि संघ के बड़े नेता सुरेश सोनी ने इस बारे में बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व से बात भी की थी। संघ का मानना था कि अगर गडकरी के खिलाफ आरोप गंभीर हुए तो किसी और को कमान सौंपनी होगी। सुरेश सोनी ने सुषमा स्वराज से इस बाबत बात भी की थी लेकिन सुषमा इसके लिए तैयार नहीं थीं। संघ उन्हें तैयार करने और लोकसभा में उनकी जगह विपक्ष का नेता ढ़ूंढ़ने में लगा लेकिन इस बीच हुई अरविंद की प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद संघ को लगा कि आरोप इतने गंभीर नहीं हैं कि नेतृत्व परिवर्तन की जरूरत है और इसलिए गडकरी को मजबूत करने के इरादे से ही संघ ने सुषमा और जेटली दोनों को प्रेस कॉन्फ्रेंस में उतारा जिससे साफ संदेश जा सके कि गडकरी के पीछे पूरी पार्टी खड़ी है।

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