नई दिल्ली।करगिल युद्ध के पहले शहीद सौरभ कालिया के परिजनों को इंसाफ दिलाने का मामला तूल पकड़ता जा रहा है। कैप्टन कालिया को करगिल युद्ध के दौरान पाकिस्तानी सैनिकों ने बंदी बना लिया था और उनके शव को बेहद खराब हालत में वापस सौंपा। शहीद कालिया के परिजनों का कहना है कि यातना देना युद्धबंदी कानून का उल्लंघन है। वो चाहते हैं कि इस आरोप में पाकिस्तानी अफसरों के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में मुकदमा चले। लेकिन सरकार तमाम समझौतों का हवाला देते हुए बेबसी जता रही है।
करगिल के पहले शहीद कैप्टन सौरभ कालिया के परिवार के ज़ख्म 13 साल बाद भी हरे हैं। उनकी एक ही मांग है कि कैप्टन कालिया को युद्धबंदी बनाकर यातना देने वाले पाकिस्तानी अफसरों के खिलाफ इंटरनेशनल कोर्ट आफ जस्टिस में मुकदमा चले। उनकी याचिका प्रधानमंत्री कार्यालय से घूमते-घूमते राष्ट्रपति के पास पहुंच गई है। लेकिन कार्रवाई का कोई कदम नहीं उठा है। करगिल युद्ध के वक्त सेनाध्यक्ष रहे जनरल वी.पी.मलिक ने सरकार के रुख को कठघरे में खड़ा किया है।

कैप्टन कालिया सिर्फ 23 साल के थे जब बटालिक के कसकर सेक्टर में गश्त करते हुए उन्हें और उनके पांच साथियों को पाकिस्तानियों ने पकड़ लिया था। तीन हफ्ते बाद वापस आए इन शूरवीरों के शव अमानवीय यातना की गवाही दे रहे थे। लेकिन भारत सरकार के आधिकारिक सूत्रों के मुताबिक इस मामले को इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस में नहीं उठाया जा सकता। चार्टर के हिसाब से इसके लिए पाकिस्तान की मंजूरी भी जरूरी होगी। यही नहीं, भारत ने इसके चार्टर पर हस्ताक्षर करते हुए खुद ये प्रावधान जुड़वाया था कि राष्ट्रमंडल मुल्कों के आपसी विवाद इस मंच पर ना उठाए जाएं।
हालांकि इस मसले को 22 सितंबर 1999 और 6 अप्रैल 2000 को संयुक्त राष्ट्र के मंच पर उठाया गया था। तत्कालीन रक्षा मंत्री जसवंत सिंह ने 1999 और 2001 में दो बार कालिया परिवार को चिट्ठी लिखकर बेबसी ज़ाहिर की थी कि पाकिस्तान इस मसले में कोई ज़िम्मेदारी लेने को तैयार नहीं है। ऐसे में सवाल ये है कि कालिया परिवार को इंसाफ कैसे मिलेगा।
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