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गैंगरेप आरोपी नाबालिग कैसे? सपा से मिला लोकसभा टिकट

| Jan 04, 2013 at 10:05am | Updated Jan 04, 2013 at 11:13am

नई दिल्ली। दिल्ली गैंगरेप केस की तरह लखनऊ में भी 7 साल पहले नाबालिग से गैंगरेप का केस एक कानूनी पेंच में उलझा है। आरोपी खुद को वारदात के वक्त नाबालिग बताता रहा है और इसी बिनाह पर गैंगरेप का मुख्य आरोपी आज तक खुलेआम घूम रहा है। वारदात की शिकार लड़की और उसका परिवार जिल्लत की जिंदगी जी रहे हैं। आरोप ये भी हैं कि आशियाना गैंग रेप केस में शामिल इस आरोपी को सत्ताधारी समाजवादी पार्टी का संरक्षण मिला हुआ है।

2 मई 2005 को शाम के करीब 7 बजे यूपी की राजधानी लखनऊ का आशियाना मोहल्ला। समाजवादी पार्टी के बाहुबली नेता का भतीजा और उसके 5 दोस्त गाड़ी में आए। आरोप है कि इन्होंने 14 साल की एक लड़की को जबरन गाड़ी में खींचा और इसके बाद हैवानियत की सारी हदें पार कर दीं। लड़की से चलती गाड़ी में बलात्कार किया गया और विरोध करने पर उसके शरीर को सिगरेट से दागा गया। मन भर जाने पर लड़की को अधमरी हालत में फेंककर फरार हो गए। 7 साल के दौरान किस्मत पलटी और आरोपियों में से तीन सड़क हादसों में मारे गए। दो को अदालत ने सजा सुनाई, लेकिन मुख्य आरोपी आज भी आजाद है। इसकी वजह है उसकी उम्र, 4 साल में यही तय नहीं हो पाया कि वारदात के वक्त वो बालिग था या नाबालिग।

असल में सत्ता बदलीं और इसी के साथ आरोपी का चाचा अपना सियासी चोला बदलता रहा। जाहिर है सियासी संरक्षण ने केस को कछुआ चाल पर ला दिया। वही समाजवादी पार्टी अब गैंगरेप के मुख्य आरोपी को संसद में भेजने पर आमादा है। नाबालिग अब बालिग हो चुका है और लोकसभा का टिकट हासिल कर चुका है। लोकसभा में उम्मीदवारी के लिए 25 साल की उम्र पूरी होनी चाहिए।

सवाल ये है कि क्या लोकसभा की उम्मीदवारी के लिए दाखिए किए जा रहे दस्तावेजों में आरोपी 25 साल पूरे कर चुका है। और सवाल ये भी कि क्या देश की सबसे बड़ी पंचायत में एक गैंगरेप के आरोपी को भेजा जाना सही है। क्या ये उस पीड़ित परिवार के जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा नहीं। जो सात साल से कानूनी लड़ाई लड़ते-लड़ते मायूस हो चुका है। जिसे लगातार धमकियां मिल रही हैं और बयान बदलने के लिए दबाव पड़ रहे हैं।

आरोपी को नाबालिग साबित करना उस रणनीति का हिस्सा था जिसकी वजह से केस को न केवल उलझाया गया बल्कि आरोपी आज तक सलाखों के पीछे नहीं पहुंच सका। इस घिनौनी वारदात जनता की कमजोर यादाश्त से उतर चुकी है और मायूस बाप अपनी लड़ाई अकेले लड़ रहा है। अदालत की ड्योढी पर सत्ता की पनाह में घूमते आरोपी की निगाहें इस परिवार को घूर रही हैं।

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