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एम्स के बाहर ठंड से ठिठुर रहे रोगियों के परिजन

| Jan 04, 2013 at 10:02am

नई दिल्ली। दिल्ली में ठंड बढ़ गई है, जमीन से लेकर आसमान तक सर्द है। फिर भी खुले में रात गुजारना और परिजनों का पेट भरने के लिए स्टोव पर खाना पकाना महिलाओं के समूह की विवशता है। यह आलम है देश के मुख्य अस्पताल अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) परिसर का।

जहां रोगियों के परिजन सर्दी में ठिठुरते हुए सड़क किनारे डेरा जमाए हुए हैं, वहीं पास में शौचालय है जहां से पेशाब की बदबू आती रहती है। बदबू झेलते हुए खाना पकाना यहां दूर-दराज से आईं महिलाओं की मजबूरी है। इससे प्रतिकूल परिस्थितियों में जीने की उनकी अदम्य भावना का पता भी चलता है।

एम्स के बाहर ऐसे लोग रह रहे हैं, जिन्हें एम्स द्वारा संचालित पास के किसी धर्मशाला में जगह नहीं मिल पाई। यहां बिहार के भागलपुर से आई 40 वर्षीया यशोदा देवी सहित देश के कई हिस्सों से आकर खुद के या परिवार के किसी सदस्य के इलाज का इंतजार कर रहे हैं।

यशोदा देवी अपने 12 साल के बेटे को लेकर यहां आई है, जिसे कैंसर है। वह एम्स के बाहर ठंड में ठिठुरते हुए दिन गुजार रही है। यशोदा ने कहा कि हमारे पास कोई दूसरा उपाय नहीं है, मुझे अपने बेटे का इलाज कराना है..भले ही इस सर्दी में खुले में क्यों न रहना पड़े। आलू छीलते हुए वह जलती लकड़ियों की लौ से खुद को गर्म करने में लगी थी।

बुधवार को दिल्ली में 44 साल बाद इतनी ठंड पड़ी कि अधिकतम तापमान 9.8 डिग्री सेल्सियस रहा। यहां सड़क किनारे ऐसे लोग ठहरे हुए हैं जिन्हें चिकित्सकों ने अगली तारीख दी है और वे अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं। कई इतने गरीब हैं कि उनके पास घर लौटने और अगली तारीख पर फिर आने के लिए पैसे नहीं हैं।

अपने छह साल के बेटे को लेकर उत्तर प्रदेश से आए रामपाल और बिहार के खगड़िया से 35 वर्षीय बेटे के इलाज के लिए आए बचकन सदा कहते हैं कि पिछल तीन महीनों से यह सड़क ही उनका घर बन चुका है। वे कहते हैं गर्मियों के दिन तो असानी से कट जाते हैं, मगर सर्दियों में उनकी हालत असहनीय हो जाती है।

तसल्ली की बात सिर्फ यह है कि एक गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) ने इन बेबस लोगों के बीच कंबल बंटवाए हैं।

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