नई दिल्ली। मुंबई के हमलावरों में से अजमल कसाब जिंदा पकड़ा गया अब जरा अंदाजा लगाइए कि क्या होता अगर हमला करने वाले आतंकवादी लोहे के बने होते। उन्हें न भूख लगती, न प्यास। उन पर हर हथियार बेकार हो जाते। ये बात अभी सोचने में अजीब लग सकती है लेकिन एक रिपोर्ट बता रही है कि आगे चलकर ये बातें सच साबित हो सकती हैं। हो सकता है कि हमारी फौजों से लोहा लेने वाली लोहे की मशीनें पाकिस्तान की हों।
फौजी टेक्नोलॉजी के एक्सपर्ट माने जाने वाले अमेरिकी शोधकर्ता पीटर सिंगर कहते हैं कि फौजी रोबोट्स बनाने में अमेरिका सबसे आगे है लेकिन रूस, चीन, पाकिस्तान और ईरान भी फौजी रोबोट्स बनाने में लगे हुए हैं।
सिंगर के मुताबिक वो दिन दूर नहीं जब जंग के मैदान पर फौजियों की जगह बेरहम मशीनें ले लेंगी। उनके लिए सिर्फ और सिर्फ एक ही चीज महत्वपूर्ण होगी और वो होगा उनका मिशन। पाकिस्तान रोबो टेक्नोलॉजी में हिंदुस्तान से आगे है लेकिन इससे भी ज्यादा खतरनाक बात ये कि रोबो टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल आतंकवादी भी कर सकते हैं।
अपने जिस्म से बम बांधकर खुद को उड़ाने के लिए रोबोट को स्वर्ग जैसी किसी चीज का लालच देने की कोई जरूरत नहीं पड़ेगी।
सिंगर ने तो यहां तक दावा किया है कि साल 2015 तक अमेरिकी फौज में आधे मानव और आधी मशीनें होंगी और अगली बड़ी जंग इंसानों के बीच नहीं बल्कि मशीनों के बीच लड़ी जाएगी। इराक की जंग में अमेरिका ने रोबोट्स इस्तेमाल किए। ये एक ऐसे फौजी की तरह हैं जिसका काम दुश्मन को ढूंढना और उसे खत्म करना है। इस मशीन पर आसानी से कोई बंदूक, मशीन गन और यहां तक की रॉकेट लांचर लगाकर इसे दुश्मन के इलाके में भेजा जाता है। इराक में ही इस्तेमाल हो रहा एक और रोबोट है Macro bat। ये देखने में छोटा जरूर है लेकिन है बेहद खतरनाक। इस पर लगे कैमरे की मदद से दुश्मन की पोजीशन का आसानी से पता लगाया जा सकता है। इसके अलावा इसमें बम लगाकर दुश्मन के परखच्चे भी उड़ाए जा सकते हैं। जमीन के अलावा आसमान में भी मशीनों का बखूबी इस्तेमाल किया जा रहा है।
अफगानिस्तान और पाकिस्तान में अमेरिका इस्तेमाल कर रहा है बिना पायलट वाले ऐसे हवाई जहाज जिनको सैटेलाइट के जरिए कंट्रोल किया जाता है। ये हैं Drone। दुश्मन के इलाके में इन जहाजों को हजारों किलोमीटर दूर से ही उड़ाया जाता है और इसका निशाना होता है एकदम अचूक। ड्रोन जैसे ही उड़ने वाले रोबोट काफी अलग-अलग साइज के होते हैं। पूरे शहर पर नजर रखने वाले ग्लोबल हॉक से लेकर एक मक्खी जैसे वॉस्प तक। लेकिन सवाल ये कि क्या मशीनों पर इतना भरोसा किया जा सकता है। क्या जंग के मैदान में मशीनें इंसानी दिमाग की जगह ले सकती हैं। क्या मशीनें सही और गलत का फैसला कर सकती हैं। आमतौर पर नहीं और ऐसा न होने पर सामने आ सकते है खौफनाक नतीजे।
3 जुलाई 1988 को फारस की खाड़ी में अमेरिकी जहाज Uss Vincennes पर लगे बेहद आधुनिक Aegis radar system ने आसमान में एक दुश्मन हवाई जहाज की मौजूदगी की इत्तिला दी। Uss Vincennes की क्रू को वो एक पैसेंजर जहाज लग रहा था लेकिन कंम्यूटर की आंखें और दिमाग उन्हें कुछ और ही बता रही थीं और इससे पहले कि कंप्यूटर को रोका जा सकता जहाज से मिसाइल छूट चुका था और ईरान का वो जहाज जिसमें 66 बच्चों समेत 290 लोग सवार थे आग के गोले में तब्दील हो गया। यानी रोबोट और मशीनें जंग को आसान तो बना सकती हैं लेकिन फैसला लेने का हक सिर्फ और सिर्फ इंसान के पास ही रहना चाहिए।
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