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मूवी रिव्यूः साल का पहला तोहफा है ‘मटरू की बिजली का मंडोला’

| Jan 12, 2013 at 03:31pm | Updated Jan 12, 2013 at 03:40pm

नई दिल्ली। फिल्म ‘मटरू की बिजली का मंडोला’ को देखा जाए तो इसे विशाल भारद्वाज की हॉलीडे मूवी कहा जा सकता है। पागलपन और पागल किरदारों से भरी फिल्म पर अच्छी बात यह है कि एक लाइट मूड में भी इस फिल्म के जरिए डायरेक्टर ने कई दिलचस्प बातें की हैं। हरियाणा के काल्पनिक गांव में अमीर उद्योगपति हैरी मंडोला यानी पंकज कपूर एक चालाक मिनिस्टर यानी शबाना आज़मी के साथ मिलकर गरीब किसानों की जमीने हथिया कर वहां एक इंडस्ट्रियल प्लांट बनाने का प्लान बना रहा है।

हैरी को शराब पीने की प्रॉब्लम है पर जब वो नशे में होता है तो वह एक अच्छा आदमी है जो गांव वालों और उनके हालात पर उनसे सहानभूति रखता हैं। यहां तक कि एक रात नशे की हालत में वो खुद के ही खिलाफ मोर्चा शुरू कर बैठता है। उसका नौकर हुकुम सिंह मटरू यानी इमरान खान को सिर्फ इसलिए हायर किया गया है ताकि वो मंडोला की पीने की आदत छुड़वा सके, पर यह कहना जितना आसान है करना उतना ही मुश्किल है। वहीं एक ऐसी डील बनी है जो दोनों पक्षों के लिए फायदेमंद रहेगी। मंडोला अपनी बिन मां की बेटी बिजली यानी अनुष्का शर्मा की सगाई उसी मिनिस्टर के बेवकूफ बेटे यानी आर्य बब्बर से तय करता है।

गुलाबी भैंस की कल्पना से लेकर जानलेवा नशे भरी फ्लाइट तक फिल्म का ह्यूमर बहुत ही खूबी के साथ शिफ्ट होता रहता है जो शायद ही कहीं गलत निकला हो। भारद्वाज करप्ट नेता और अमीर उद्योगपतियों पर भी समय पर कटाक्ष करते रहते हैं और उस गरीब जनता को सपोर्ट करते हैं जो इन सब के बीच पिस जाता हैं। शानदार संगीत और बेहतरीन कहानी के साथ डायरेक्टर इन अजीब किरदारों में जान डालते हुए इन्हें बहुत ही खूबसूरती से पर्दे पर उतारते हैं।

मंडोला और मटरू के बीच की केमिस्ट्री देखने लायक है, जिसका पता उस सीन से चलता है जिसमें वो एक कुंए को अपने रास्ते में खड़ा होने की सजा देने का फैसला करते हैं। वहीँ बिजली भले ही बिगड़ैल हो, लेकिन उसके अंदर की संजीदगी सामने आती है, ख़ासतौर पर उन सीन्स में जिसमे वो अपने पिता के साथ है। यहां अगर कोई चीज़ बनावटी लगती है तो वो है मटरू और उसके पुराने कॉलेज फ्रेंड के बीच की बातचीत जिससे वो मदद मांगने जाता है, या जिस तरह से शबाना आज़मी के करप्ट मिनिस्टर के किरदार को बनाया गया है।

इस फिल्म की भाषा और एसेंट उतना जाना पहचाना नहीं लगता, इस वजह से इसकी आदत पड़ने में थोड़ा वक्त लग जाता हैं। इसके हर जोक और डायलॉग को समझ पाना ज़रा मुश्किल है और यह देखते हुए इसकी राइटिंग इतनी अच्छी है यह अफसोस की बात हैं। पूरी कास्ट में अनुष्का शर्मा साफ तौर पर एक जिंदादिल और लेकिन अंदर से दर्दभरी लड़की के किरदार में डिपेंडेबल हैं। पंकज कपूर जैसे वेटरन के साथ एक्टिंग करते हुए और मटरू के किरदार में पूरी तरह समाते हुए इमरान खान अपने शानदार अभिनय से आपको चौका देंगे।

फिल्म पूरी तरह से जाती है पंकज कपूर को, जो इस अनोखे से मंडोला के किरदार में घुसने में कोई कमी नहीं छोड़ते। यह मजेदार है कि कैसे वो नशे की हालत में ही एक दम सही बात कह जाता है, पर आर्य बब्बर नेता के बेवकूफ बेटे के तौर पर अपने बेहतरीन काम से आप सभी का दिल जीत लेंगे। वो कैसी अपनी मंगेतर को जूलू डांसिंग ट्रापू गिफ्ट करते हैं, यह उनकी मां की चालाकियों पर उनका देर से आने वाला रिएक्शन देखने लायक हैं और इस चार्मिंग फिल्म में वो एक सरप्राइज पैकेट की तरह हैं।

फिल्म ‘सात खून माफ’ की निराशा के बाद लौटते हुए विशाल भारद्वाज एक मजेदार और रेलीवेंट फिल्म देते हैं। मै फिल्म ‘मटरू की बिजली का मंडोला’ को पांच में से चार स्टार देता हूं, साल का पहला तोहफा आ गया हैं, इसे मिस मत करिएगा। (विस्तृत समीक्षा के लिए वीडियो देखें)

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