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दिल्ली गैंगरेप केस में आरोपियों पर आज तय होंगे आरोप

| Feb 02, 2013 at 10:13am | Updated Feb 02, 2013 at 10:27am

नई दिल्ली। दिल्ली गैंगरेप केस में आज आरोप तय किए जाएंगे। दिल्ली में साकेत के फास्ट ट्रैक कोर्ट में 5 आरोपियों पर आरोप तय किए जाएंगे। सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक पुलिस ने चार्जशीट में कहा है कि आरोपियों ने पीड़ित की बलात्कार के बाद हत्या की योजना पहले ही बना ली थी और साजिश के तहत पीड़ित और उसके दोस्त को बस में बिठाया गया। पुलिस ने कोर्ट में जमा कराई चार्जशीट के 57 पन्नों में इस वारदात से जुड़ी हर जानकारी का बारीकी से ब्यौरा दिया है। आज इसी चार्जशीट के आधार पर 5 आरोपियों पर चार्जेज फ्रेम होंगे।

इन सभी आरोपियों ने जो किया वो दरिंदगी से कम क्यों नहीं कहा जा सकता।

पुलिस ने अपनी चार्जशीट में इन पर आरोप लगाया है कि आरोपियों ने चलती बस के भीतर गैंगरेप करने की योजना पहले ही बना ली थी, मुनीरका बस अड्डे पर पीड़ित लड़की को देखने के बाद उन्होंने तय किया कि उसी के साथ गैंगरेप करेंगे। इसके बाद उन्होंने साजिश के तहत पीड़ित और उसके दोस्त को बस के भीतर बुला लिया। इस वक्त चार आरोपी ड्राइवर के केबिन में थे और बाकी दो पीछे की दाहिनी और बाईं सीट पर थे। सूत्रों की मानें तो गैंगरेप के बाद आरोपी लड़की और उसके दोस्त की हत्या भी कर देना चाहते थे। मकसद ये कि ना सबूत बचे और ना ही ये पता लगे कि किसने इस वारदात को अंजाम दिया। गैंगरेप के बाद एक आरोपी ने कहा था कि लड़की मर गई है इसे बाहर फेंक दो।

सूत्रों का कहना है कि आरोपी राम सिंह ने पूछताछ के दौरान पुलिस के सामने खुद ये बात कबूल की है। पुलिस ने कोर्ट में जमा कराई चार्जशीट के 57 पन्नों में इस वारदात से जुड़ी हर जानकारी का बारीकी से ब्यौरा दिया है। चार्जशीट में पुलिस ने सोलह दिसंबर की रात चलती बस में आधे घंटे तक चली दरिंदगी का पूरा कच्चा चिट्ठा खोला है। सूत्रों का कहना है कि चार्जशीट में पुलिस ने बस की जांच के बाद सीएफएसएल रिपोर्ट से मिली जानकारियों को भी विस्तार से बताया है। सूत्रों के मुताबिक सीएफएसल जांच के दौरान बस में 5 जगहों पर खून के धब्बे पाए गए। ये धब्बे छठी सीट, पिछले गेट, पिछली फ्लोर, पिछले दरवाजे की सीढ़ी और दरवाजे पर मिले। वारदात के दौरान राम सिंह ने पीड़ित को दांत से भी काटा था जिसकी वजह से उसका सलाइवा टेस्ट भी कराया गया। जांच में ये पता चल गया है कि गैंग रेप और मारपीट के दौरान बस मुकेश चला रहा था लेकिन जब मुकेश रेप में शामिल हुआ तो बस अक्षय ठाकुर चलाने लगा।

पूरे मामले को पुख्ता बनाने के लिए पुलिस ने गैंग रेप में इस्तेमाल बस की दो दिनों तक फोरेंसिक जांच कराई। इसके अलावा और भी कई फॉरेसिंक जांच कराए गए इसके जो परिणाम सामने वो इस मामले के अहम सबूत साबित होंगे। सूत्रों के मुताबिक चार्जशीट में पुलिस ने कोर्ट को बताया है कि इस केस में आरोपियों के खिलाफ 13 धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया है। राम सिंह और उसके साथियों पर हत्या, हत्या की कोशिश, डकैती, गैंग रेप, लूट, हथियारों के बल पर डकैती, अप्राकृतिक यौनाचार, अपहरण, सबूतों के साथ छेड़छाड़, कॉमन इंटेंशन और आपराधिक साजिश की धाराएं लगाई गईं हैं। पुलिस चार्जशीट का बाकी हिस्सा इलेक्ट्रॉनिक रूप में आज साकेत कोर्ट में जमा कराएगी। साकेत कोर्ट आज से चार्जशीट पर सुनवाई शुरू करेगी।

अब जघन्य बलात्कार के मामलों में दोषियों को फांसी की सजा मिलेगी। शुक्रवार को हुई केंद्रीय कैबिनेट बैठक में एक अध्यादेश पास किया गया जिसे राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए भेज दिया गया है। इस अध्यादेश में शारिरिक रूप से अक्षम होने या कोमा की स्थिति में पीड़ित के जाने पर बलात्कारी को फांसी की सजा भी दी जा सकती है। अध्यादेश में बलात्कार को यौन हमले की संज्ञा दी गई है। दिल्ली में 16 दिसंबर को चलती बस में हुए गैंगरेप और भयानक यौन टॉर्चर के बाद उमड़ा जनाक्रोश आखिर रंग लाया। बलात्कार के बाद मौत से जूझती उस बहादुर लड़की का आत्मबल और संघर्ष आखिर रंग लाया। अब बलात्कार और वहशी यौन टॉर्चर करने वालों को फांसी पर लटका दिया जाएगा। जनता के गुस्से को समझते हुए आखिर केंद्र सरकार ने बेहद अहम फैसला ले लिया। केंद्रीय कैबिनेट ने महिलाओं के खिलाफ अपराध संबंधी कानून को सख्त बनाने के लिए बनी जस्टिस जे एस वर्मा कमेटी की सिफारिशों पर अमल करते हुए तुरंत कानून को सख्त करने के लिए अध्यादेश लाने को मंजूरी दे दी।

अध्यादेश को राष्ट्रपति की मंजूरी लेनी होगी। सूत्रों का साफ कहना है कि उसके बाद अब बलात्कार के जघन्य मामलों में दोषी को सजा-ए-मौत की सजा दी जाएगी। अध्यादेश में जघन्य बलात्कार के मामले को एक्स्ट्रीम केस की संज्ञा दी गई है। वो जघन्य मामले जिसमें बलात्कारी बलात्कार के अलावा पीड़िता के शरीर को चोट पहुंचाए, जिसके चलते वो उसके अंग हमेशा के लिए नाकाम हो जाएं, अक्षम हो जाएं, ऐसी चोट को जघन्य माना जाएगा। मिसाल के तौर पर मुंबई का अरुणा शॉनबॉग केस, जिसमें अस्पता की नर्स के साथ बलात्कार करते वक्त वॉर्ड ब्वाय ने उसकी गर्दन को इतनी कस कर दबाया कि उसके दिमाग का एक हिस्सा ही नाकाम हो गया और वो कोमा में चली गई। या फिर दिल्ली की चलती बस में गैंगरेप की शिकार बनी वो पीड़ित जिसके साथ एक जंग लगी रॉड से भयानक टॉर्चर किया गया और उसकी आंतें तक बाहर आ गईँ।

इतना ही नहीं अध्यादेश के जरिए अब बलात्कार शब्द की जगह यौन हमले या यौन उत्पीड़न शब्द का इस्तेमाल किया जाएगा। अध्यादेश में बलात्कारी को 20 साल से लेकर पूरी उम्र सलाखों के पीछे धकेलने का प्रावधान भी किया गया है। पब्लिक प्लेस में छेड़छाड़, महिला के कपड़े फाड़ना, महिला का पीछा करना, महिलाओं की तस्करी ही नहीं बल्कि महिलाओं पर तेजाब से किए जाने वाले हमले की सख्त सजा भी रखी गई है। हालांकि, इस अध्यादेश में जस्टिस वर्मा की दो सिफारिशें नहीं मानी गईं। मैराइटल रेप यानि वैवाहिक रिश्ते में पति की ओर से होने वाली जोर-जबरदस्ती को इस अध्यादेश में शामिल नहीं किया गया है। इसके अलावा अक्सर मानवाधिकार हनन का दोषी करार दिया जाने वाला आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पॉवर एक्ट यानि एएफएसपीए को भी इसके दायरे से बाहर रखा गया है। जस्टिस वर्मा की दलील थी कि ये दोनों भी महिलाओं के खिलाफ अपराध का आधार तैयार करते हैं। लेकिन कैबिनेट ने इन दोनों को क्रिमिनल लॉ के अधीन नहीं माना।

महिलाओं के खिलाफ अपराध के खिलाफ कानून सख्त बनाने के लिए अध्यादेश लाने का फैसला बजट सत्र से मात्र 20 दिन पहले आनन फानन लिया गया है। दिसंबर में हुए दिल्ली गैंगरेप के बाद लोगों के उबाल के बाद से सरकार दबाव में थी। दबाव ये था कि किस तरह से महिलाओं पर होने वाले जुर्म की सजा को और कड़ा किया जाए। संविधान के मुताबिक इस अध्यादेश को आने वाले बजट सत्र के शुरुआत के 6 हफ्तों के भीतर कानून की शक्ल देनी पड़ेगी। सरकार के इस फैसले के बाद गैंगरेप पीड़ित के पिता ने भी संतोष जताया है। पीड़ित के पिता के मुताबिक देर से ही सही लेकिन सरकार ने ये सही कदम उठाया है और आने वाले वक्त में इसका असर दिखेगा। महिलाओं के खिलाफ अपराध पर केंद्र सरकार सख्त कानून लाने की ओर कदम बढ़ा चुकी है और इसके साथ ही लड़कियों की सुरक्षा को लेकर गुस्सा दिखाने वाले लोगों को उम्मीद की किरण नजर आने लगी है। उम्मीद एक बेहतर कल की जहां लड़कियां घर के भीतर और बाहर खुद को महफूज महसूस कर सकें।

सवाल उठता है कि क्या बदलाव के इस बयार के लिए 16 दिसंबर की घटना का होना जरूरी था। क्या सरकार पहले ये कदम नहीं उठा सकती थी। इस अध्यादेश के लागू होने के बाद बलात्कार के दोषियों को सख्त सजा मिलनी तय है। दिल्ली गैंगरेप के 5 आरोपी भी इसके तहत कड़ी सजा के हकदार होंगे। लेकिन जिस छठे आरोपी को नाबालिग करार दिया गया है, उसे इसके तहत सजा नहीं दी जा सकती, जबकि पुलिस की जांच में ये बात सामने आ गई है कि नाबालिग आरोपी ही वो शख्स है, जिसने पीड़ित के साथ दरिंदगी की हदें पार कर दीं। पीड़ित के पिता का मानना है कि रेप जैसे मामले में किसी अपराधी को नाबालिग होने का फायदा नहीं मिलना चाहिए। पीड़ित का परिवार वारदात में शामिल सभी आरोपियों को बराबर सजा मिलने की उम्मीद कर रहा है। अब सबकी नजरें बजट सत्र पर हैं, जब इस अध्यादेश पर संसद की मुहर लगेगी और ये कानून की शक्ल ले लेगा। हालांकि कानून में बदलाव की मांग काफी सालों से चल रही थी, लेकिन दिल्ली गैंगरेप केस ने समूचे देश को झकझोर कर रख दिया। देशभर में जनता सड़क पर आ गई। सरकार के लिए ये मुश्किल की घड़ी थी। ऐसे में जनाक्रोश के दबाव में कैसे मुकम्मल अंजाम तक पहुंचा ये अध्यादेश।

संसद तक रास्ता बनाने के लिए इस अध्यादेश को कई चरणों गुजरना पड़ा। इसे जनाक्रोश का ही असर कह सकते हैं कि सारा काम तय वक्त पर हुआ। गैंगरेप के हफ्ते भर के अंदर 23 दिसंबर को गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे मीडिया से रूबरू हुए। 23 दिसंबर की रात गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे ने एक नोटिफिकेशन जारी किया। ये नोटिफिकेशन बलात्कार और यौन हिंसा से जुड़े मौजूदा कानून में बदलाव के लिए बनी कमेटी का था। इस कमेटी की कमान पूर्व चीफ जस्टिस जे एस वर्मा को सौंपी गई। तीन सदस्यीय इस कमेटी में हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट की पूर्व चीफ जस्टिस लीला सेठ और पूर्व सॉलिसिटर जनरल गोपाल सुब्रह्मण्यम भी शामिल थे। सरकार ने कमेटी से 30 दिनों के भीतर रिपोर्ट देने को कहा। कमेटी का काम यौन हिंसा से जुड़े मौजूदा कानून की समीक्षा करने का था। जनाक्रोश को देखते हुए खुद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने चुप्पी तोड़ी और लोगों की नाराजगी को सही ठहराया। प्रधानमंत्री ने बयान जारी कर कहा कि इस वीभत्स घटना को लेकर जनाक्रोश सही और उचित है। मैं आपको भरोसा दिलाता हूं कि देश में महिलाओं की सुरक्षा के लिए सभी मुमकिन कदम उठाए जाएंगे। इधर धरना प्रदर्शन का दौर जारी था और दूसरी तरफ कमेटी का काम भी।

वक्त की नजाकत समझने के मामले में कमेटी की तारीफ करनी होगी क्योंकि वर्मा कमेटी ने अपनी रिपोर्ट तय वक्त से एक दिन पहले ही 23 जनवरी को सरकार को सौंप दी। इस रिपोर्ट में वर्मा कमेटी ने बलात्कार के रेयरेस्ट ऑफ द रेयर मामलों में सजा-ए-मौत की सिफारिश की। जस्टिस वर्मा के मुताबिक उन्हें देश विदेश से हर पेशे और धर्म के 80 हजार लोगों की तरफ से सुझाव मिले। कमेटी को अपनी रिपोर्ट बनाने में सिर्फ 29 दिन लगे। जस्टिस वर्मा ने कहा कि सरकार भी तेजी दिखाए और अगले सत्र में सिफारिशों के आधार पर कानून में संशोधन करे। अब दबाव सरकार पर था कि वो जल्द से जल्द इन सिफारिशों को कानून की शक्ल दे। डर इसी बात का था कि कहीं देरी के चलते सरकार को फिर से जनाक्रोश का सामना न करना पड़े। लिहाजा महिलाओं के खिलाफ अपराध के खिलाफ कानून सख्त बनाने के लिए अध्यादेश लाने का फैसला बजट सत्र से 20 दिन पहले ले लिया

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