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दिल्ली में हर लाल बत्ती बिकाऊ, 1 प्वाइंट के 1 लाख!

| Feb 08, 2013 at 10:18pm | Updated Feb 09, 2013 at 10:10am

नई दिल्ली। राजधानी दिल्ली की सड़कों पर मंडी सजी हुई है। दिल्ली की हर सड़क, हर लाल बत्ती, हर वाहन इस मंडी के कब्जे में है। दिल्ली की हर रेड लाइट पर मौजूद है-घूस बत्ती। घूस बत्ती के दो किरदार हैं, पहला-वो ट्रांसपोर्टर जो सड़कों पर नियमों को रौंदते हैं और दूसरा-वो वर्दीवाले जो इन नियमों को रौंदने का लाइसेंस देते हैं। ये धंधा कुछ ट्रांसपोर्टरों की मदद से बेनकाब हुआ। उनका दावा है कि दिल्ली में पुलिस एक-एक रेड लाइट यानि एक प्वाइंट से हर महीने एक लाख रुपये तक की वसूली करती है।

आरटीवी मालिक कुलवंत सिंह कहते हैं कि कोई भी पेपर दिखाओ, इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। पेपर सही हैं या नहीं, पैसे तो देने ही पड़ते हैं, नहीं तो बंद कर देते हैं। ट्रक मालिक सुरेंद्र भड़ाना कहते हैं कि हर ट्रक से हर रेड लाइट के लिए 500 रुपये एंट्री ली जाती है, नहीं तो गाड़ी बंद कर दी जाती है।

बस मालिक मोहम्मद जावेद कहते हैं कि गैंगरेप के बाद हुई सख्ती से पुलिस की कमाई और बढ़ गई है। सख्ती से क्या होता है। ये सख्ती के बहाने और वसूली करने लगते हैं। मो. कमर खान कहते हैं कि पुलिस वाले हर रेड लाइट की एंट्री के बदले महीने में 500 रुपये लेते हैं। ना देने पर बस को बंद कर देते हैं या चालान काटते हैं।

घूस बत्ती- यानि एक कोशिश दिल्ली की रेड लाइट पर फिरौती मांगते शहर के रखवालों के चेहरे पर पड़े नकाब खींचने की। कुछ ट्रांसपोर्टरों से बातचीत हुई तो वो मदद को तैयार हो गए। शायद रोज-ब-रोज घूस के कैंसर से वो भी तंग आ चुके थे, सो खुफिया कैमरा लेकर हम साथ चले। उनकी गाड़ी आगे और हम पीछे। किसी लाल बत्ती पर पहुंचते इससे पहले ही दिल्ली पुलिस के एक जवान ने गाड़ी रोक ली। ये सब इतना अचानक हुआ कि ये बातचीत रिकॉर्ड नहीं हो सकी लेकिन गाड़ी के पेपर देखने के बजाय ट्रांसपोर्टर ने जैसे ही हाथ में सौ-सौ के दो नोट थमाए, हमारी गाड़ी को हरी झंडी मिल गई।

आगे बढ़े और पहुंचे कालिंदी कुंज, इसी जगह से बिना परमिट वाली आरटीवी बसें चलती हैं। हमारे मददगार बने दो ट्रांसपोर्टरों को तो शहर में डंपर की एंट्री करवानी थी। एक कार में दो ट्रैफिक पुलिसवाले बैठे थे, उसी गाड़ी में उनसे बात हुई।

ट्रांसपोर्टर-डंपर

ट्रैफिक पुलिस-डंपर लिया है

ट्रांसपोर्टर-मैंने ना लिया भाई...परवेज भाई का है।

ट्रैफिक पुलिस-कुछ पैसे-वैसे दे दे यार।

ट्रांसपोर्टर-अरे बाबूजी दे दूंगा।

ट्रैफिक पुलिस-कुछ तो दे दे।

ट्रांसपोर्टर-मेरी थोड़ी है यहां। मैं इनके साथ ही आया हूं।

ट्रैफिक पुलिस-दे दे पैसे तो दे दे।

ट्रांसपोर्टर-कौन है यहां, जोनल ऑफिसर कौन है?

ट्रैफिक पुलिस-उनको छोड़ ना। ये हैं जोनल ऑफिसर।

ट्रांसपोर्टर-ले। 6 सौ दे दें।

ट्रैफिक पुलिस-हजार दे दे।

ट्रांसपोर्टर-ना कोई गाड़ी-घोड़ा चल ना रही। हम तो भीख मांगने को तैयार हैं।

हम आगे बढ़े, देखा ट्रैफिक पुलिस वाले चालान काटने में लगे हैं। एक ट्रांसपोर्टर की आरटीवी बस को रोका हुआ था। जब ट्रांसपोर्टर ने आरटीवी छोड़ने की बात की तो दिल्ली ट्रैफिक पुलिस वाले ने सरकार के डंडे की दुहाई दी। बोला अभी माहौल खराब है - कुछ दिन अवैध वाहन खड़ा रखो, थोड़ा धैर्य रखो।

ट्रैफिक पुलिस-साल भर से तुम्हें छेड़ा नहीं। कोई ना कोई बात होगी ना। हमारे ऊपर भी डंडा है। सरकार का भी डंडा है।

ट्रांसपोर्टर-वो तो है साहब।

ट्रैफिक पुलिस-बेटे मैं तुम्हारी पूरी मदद कर दूंगा। अभी माहौल खराब है।

ट्रांसपोर्टर-हमारी तो वो आदत है साहब कि जियो और जीने दो वाला काम करते हैं साहब हम।

ट्रैफिक पुलिस-हमारी तो यही सलाह है कि थोड़े दिन खड़ी रखो..गरम माहौल है..बहुत गरम माहौल है।

ट्रांसपोर्टर-खड़ी करने का मौका तो दे दो साहब।

ट्रैफिक पुलिस-10-15 दिन का मामला है..ज्यादा नहीं है..फिर कहीं और डाइवर्ट हो जाएगा।

ट्रांसपोर्टर-देख लो अजय पाल साहब।

ये समझना थोड़ा मुश्किल था कि आखिर हर गाड़ी से पैसे लेने वाले ये पुलिसवाले उसका रिकॉर्ड कैसे रखते हैं। पता चला कि दिल्ली में इसके लिए एक खास शब्द का इस्तेमाल होता है-एंट्री करवा लो। यानि ट्रैफिक पुलिस वाले की डायरी में पैसे देकर गैरकानूनी तरीके से गाड़ी चलाने का लाइसेंस ले लो। कैमरे पर ही ट्रांसपोर्टर ने चार डंपर वाहनों की एंट्री 800 रुपये में खरीद ली।

ट्रांसपोर्टर-किस-किस गाड़ी की करानी है?

ट्रैफिक पुलिस-चार गाड़ियों के 800 रुपये।

ट्रांसपोर्टर-अगले महीने 15 तारीख को टाइम पर आ जाऊंगा।

ट्रैफिक पुलिस-तू बीच में आ जाना।

ट्रांसपोर्टर- साहब मेरी बात तो सुनो। चोरी का रेता होता है। गाड़ी आप रोक लेते हो और सेल टैक्स वालों को पता चल जाता है। भागम भाग में चलाना पड़ता है। ये दिक्कत आ जाती है।

ट्रांसपोर्टर ने यहां तक कहा कि उसके डंपर में चोरी का रेता होता है, लेकिन ये वर्दीधारी जैसे कानों में रुई ठूंसे हुए हैं। चोरी का माल हो, अपना हो, दूसरे का हो, डकैती का हो, इन्हें मतलब सिर्फ घूस से है और घूसबत्ती पर अपनी ड्यूटी निभाने से है। अगला ठिकाना - दिल्ली का जैतपुर इलाका। हमारे साथ गए ट्रांसपोर्टर ने आरटीवी बस की एंट्री की बात छेड़ी।

ट्रांसपोर्टर-मेरी तो तीन गाड़ियां हैं।

ट्रैफिक पुलिस-कौन-कौन सी?

ट्रांसपोर्टर-1591...0540...9250।

ट्रैफिक पुलिस-नंबर तो लिख जाएगा.. चलती तो हमारे पास हैं ना।

ट्रांसपोर्टर-हां...शाम को भर कर ले आता है।

ट्रैफिक पुलिस-हां ठीक है तो एंट्री करा ले।

ट्रांसपोर्टर-एंट्री करवा लेता हूं।

ट्रैफिक पुलिस-एंट्री करवा दो।

ट्रांसपोर्टर-एंट्री करवा देता हूं जनाब बताओ...

ट्रांसपोर्टर-फिर कह रहा है बताओ...जैसे पहली बार आया हो।

ट्रांसपोर्टर-बार-बार बताने की नहीं, इतनी सख्ती चल रही है...गाड़ी तो हमारी खड़ी है।

ट्रैफिक पुलिस-कैमरा-फैमरा तो नहीं लगा रखा है..रिकार्ड कर रहे हो कुछ...।

ट्रांसपोर्टर-अरे कैसी बात कर रहे हो जनाब...ये लो, ये देख लो...चेक कर लो। ऐसी बातें मत किया करो। पहली बार ना चल रही। 12 साल हो गए यहां पर...।

ट्रैफिक पुलिस-कोई बात नहीं।

ट्रैफिक पुलिस-देख बात सुन। तेरी गाड़ी को कोई दिक्कत नहीं होगी। नंबर लिखकर दे दे। कोई होगी तो फोन कर देंगे। पहले फोन कर देंगे।

मसलन दिल्ली की एक लाल बत्ती पर खड़ा ट्रैफिक पुलिसवाला एक आरटीवी बस चलवाने की घूस लेने के बाद ये कह रहा है कि अगर कोई दिक्कत आएगी तो वो खुद पहले से फोन कर चेतावनी दे देगा। यानि अगर कोई चेकिंग हुई, ऊपर से कोई जांच हुई तो ये वर्दीधारी ही अपने विभाग की खबर सबसे पहले इस ट्रांसपोर्टर को बताएगा। ये तनख्वाह सरकार से लेता है लेकिन नौकरी ट्रांसपोर्टरों की बजाता है।

(पूरे स्टिंग ऑपरेशन के लिए वीडियो देखें)

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