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महिलाओं का हक मारा तो शुरू किया ‘डेरा डालो-घेरा डालो’

Posted on Feb 12, 2013 at 06:19pm IST | Updated Feb 25, 2013 at 06:12pm IST

गाजीपुर। गाजीपुर में पचासों ऐसी महिलाएं हैं जिनका खुलेआम शोषण किया जा रहा है उनका हक मारा जा रहा है। वो अपने हक के लिए आंदोलन तक कर रही हैं। लेकिन कोई उनकी सुनने वाला नहीं। अब इन महिलाओं ने खुद ही कुछ करने का बीड़ा उठाया है। इन्होंने इस आंदोलन को नाम दिया है डेरा डालो, घेरा डालो। ये महिलाएं मिड डे मील योजना के तहत स्कूलों में रसोइये का काम करती थीं या कर रही हैं, लेकिन लंबे समय से इनको मेहनताना नहीं दिया जा रहा है।

नियम के मुताबिक जिस स्कूल में महिला रसोइयों की नियुक्ति हो वो उसी ग्राम पंचायत की निवासी होना चाहिए, साथ ही जरूरी है कि उसका बच्चा उसी स्कूल में पढ़ रहा हो। महिला रसोईयों की नियुक्ति ग्राम पंचायत और शिक्षा विभाग मिलकर करता है। नियुक्ति एक साल के लिए होती है जिसे बढ़ाया भी जा सकता है।

महिलाओं का हक मारा तो शुरू किया ‘डेरा डालो-घेरा डालो’
इन्हीं महिलाओं में से एक सुगंती कुशवाह का कहना है कि मैं भी रसोइये का काम करती थी लेकिन मेरा भी दो साल का भुगतान अब तक नहीं किया गया। हर साल होने वाली इस नियुक्ति की आड़ में ना सिर्फ भ्रष्टाचार बल्कि हम महिलाओं का शोषण हो रहा है इतना ही नहीं काम के बदले मिलने वाला पैसा भी हमको समय पर नहीं मिलता।




यही वजह है कि प्रधान और पंचायत की मिलीभगत से पिछले कुछ सालों के दौरान ऐसी महिलाओं की नियुक्ति हुई जो इस पद के काबिल नहीं थीं। उनमें से कई महिलाओं के बच्चे या तो उस स्कूल में नहीं पढ़ रहे हैं या फिर वो स्कूल ही नहीं जातीं और जो काबिल महिला रसोइये के तौर पर काम कर रही हैं उनसे कई बार प्रधान और हेडमास्टर इस बात का दबाव बनाते हैं कि अगले साल उनकी नियुक्ति तभी होगा जब वो उनके घरों का निजी काम भी करेंगी।

इनका कहना है कि उनसे पशुओं को चारा खिलाना, बर्तन साफ करने या फिर घर में झाडू लगाने का काम कराया जाता है। गाजीपुर जिले में करीब 73 सौ महिलाएं रसोइये के तौर पर काम कर रही हैं। इनको हर महीने 1 हजार रुपए मानदेय के तौर पर मिलने चाहिए, लेकिन 3-4 महीने में ये पैसा एक बार मिलता है जिसके एवज में कुछ पैसा हेडमास्टर या प्रधान ले लेता है। इनमें से कई महिलएं तो ऐसी हैं जिनका सालों से पैसा बकाया है। यही नहीं महिला रसोइयों के लिए छुट्टी का भी कोई प्रबंध नहीं है।

इन महिलाओं का कहना है कि इतने मुश्किल हालात के बावजूद हमें अपना घर भी चलाना होता है, इसलिए अक्सर हम महिलाएं चुपचाप इस शोषण को सहती हैं। लेकिन अब पानी सिर से ऊपर निकल गया है इसलिए हमने राह पकड़ी आंदोलन की। हमने अपनी मांगों को लेकर पिछले साल तहसील मुख्यालय के शहीद पार्क पर लगातार 5 दिन धरना दिया। तब हमें आश्वासन दिया गया कि इस साल 17 जनवरी तक हमारी समस्याओं का समाधान कर दिया जाएगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ। आज मैं बनी हूं सिटिजन जर्नलिस्ट, इसलिए मैं जा रही हूं डिस्ट्रिक्ट मिड डे मिल इंचार्ज के पास। ये जानने के लिए कि कब तक हमारी मांगों पर कार्रवाई होगी।

सुगंती कुशवाह कहती हैं कि ऐसा नहीं है कि अफसर सच्चाई से अंजान हों लेकिन वो कार्रवाई ही नहीं करना चाहते। इसलिए मैं जा रही हूं जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी से मिलने के लिए। अफसर भले ही कार्रवाही का आश्वासन दें लेकिन जरूरी है कि ग्राम प्रधान पर भी कुछ लगाम लगे। इसलिए अब मैं जा रही हूं CDO से मिलने के लिए। डेरा डालो, घेरा डालो ये सिर्फ आंदोलन नहीं, हमारे हक की लड़ाई है और ये तब तक जारी रहेगी जब तक हमारी मांगों पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो जाती।

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