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फिल्म समीक्षा: बोरियत से भरी ‘ए गुड डे टू डाइ हार्ड’

| | Feb 23, 2013 at 05:05pm | Updated Feb 23, 2013 at 05:50pm

मुंबई। फिल्म ‘ए गुड डे टू डाइ हार्ड’ डाई हार्ड सीरीज की एक और फिल्म जो दर्शकों के मन में शायद कोई खास जगह नहीं बना पाएगी। इस फिल्म को देखते वक्त पहले डाई हार्ड फिल्मों की यादों को रोक पाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन सा है। बहुत दुख से कहना पड़ता है कि इस फिल्म में सिवाए बोरियत के कुछ और नहीं है।

जॉन मूर द्वारा निर्देशित ये फिल्म एक टीपिकल एक्शन फिल्म है जिसमें मुख्य किरदार जॉन मेक् क्लेन की भूमिका एक बार फिर ब्रूस विलिस द्वारा निभाई गई है, जो अपने व्यक्तिगत कारणों से मॉस्को के सफर पर निकल पड़ते हैं। ये व्यक्तिगत कारण है उनका इक्लौता बेटा जैक जो की जै कोर्टनी स्क्रीन पर प्ले करते है, जो एक मर्डर केस के सिलसिले में जेल में है। उसकी मदद करने में मेक् क्लेन किस तरह आतंकी चाल में उलझ कर रह जाते है और किस चालाकी से बाहर निकलते है, ये फिल्म का खास हिस्सा है।

इस फिल्म की स्क्रिप्ट में ना तो कुछ खास प्लॉट नजर आता है और न ही फिल्म के एक्शन को समझना आसान है। यकीनन इस फिल्म में बड़े एक्शप्लोजन, कार चेज़, हेलिकॉप्टर क्रैश और कभी न खत्म होने वाली लड़ाई है। लेकिन ये सब एक वीडियो गेम ही लगते हैं। हां कुछ कुछ वन लाइनर इस फिल्म में पुराने ब्रूस वीलिस की याद दिलाते हैं लेकिन उनमें अब कोई करिश्मा नहीं रहा। उनके बेटे के रोल में जै कोर्टनी बहुत हल्के नजर आते है। मैं ‘ए गुड डे टू डाइ हार्ड’ को पांच में से 1.5 स्टार देता हूं। इसमें कुछ भी खास नया या मजेदार नही है।

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