नई दिल्ली। इस्लामी मुल्कों के युवाओं को अपनी खुफिया एजेसी आईएसआई के जरिए बरगलाकर आतंकवाद के दलदल मे धकेलने के पाकिस्तानी इरादों को बंगलादेश में इस बार करारा झटका लगा है। वहां का युवा युद्ध अपराधी कट्टरपंथी ताकतों को खदेडने और देश में लोकतंत्र की जडे मजबूत करने के लिए आंदोलित होकर सड़कों पर अलख जगा रहा है।
बांग्लादेश की राजधानी ढाका का शाहबाग इन दिनों मिस्र के तहरीर चौक की तरह क्रांति का प्रतीक बना हुआ है और इस चौक पर दिल्ली के जंतर मंतर जैसा नजारा है। दोनों स्थानों पर युवा मोमबत्ती जलाकर अपने मजबूत इरादों का प्रदर्शन कर रहे हैं। फर्क सिर्फ यह है कि 16 दिसंबर की गैंगरेप की घटना पर भारत सरकार की सक्रियता के बाद जंतर मंतर पहले की तरह अब विभिन्न संगठनों की अलग-अलग मांगों को उठाने के लिए लोकतंत्र का प्रदर्शन मैदान बन गया है और ढाका के शाहबाग चौक से एक ही आवाज आ रही है, देशद्रोहियो को दफना दो, मुजाहिदीनो को देश निकाला दो। आईएसआई की कब्र खोदो। हमें लोकतंत्र चाहिए, मुजाहिदीन नहीं।

शाहबाग चौक पर आक्रामक नारे लगाते और बंगलादेश के झंडे को फहराते इन युवाओं के साथ जुटी भारी भीड़ और मोमबत्तियां जलाते प्रदर्शनकारियों के बीच एक बच्ची अपनी तोतली आवाज मे गाते हुए सबका ध्यान आकर्षित करती है। बाबा आमि जुद्दे जोबो, जुद्दे जोबो, आमि देश के भालोबाशी (पिता जी मैं युद्ध में जाऊंगी। युद्ध में जाऊंगी। मैं अपने देश को बेहद प्यार करती हूं।)
बांग्लादेश में कट्टरपंथियों के खिलाफ आवाज उठाना कठिन था, लेकिन पांच फरवरी को अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण आईसीटी ने प्रधानमंत्री शेख हसीना के नेतृत्व मे ऐसे ही एक देशद्रोही और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी की प्रमुख खालिदा जिया के शासनकाल में 2001 से 2006 तक कैबिनेट मंत्री रहे कट्टरपंथी संगठन जमात ए इस्लामी के प्रमुख अब्दुल कादिर मोल्ला को युद्ध अपराध के आरोप में आजीवन कारावास की सजा सुनाई तो बांग्लादेश में एक तरह का तूफान आ गया।
फैसला आते ही जमात के कट्टरपंथी समर्थक भड़क गए और सरकार के खिलाफ हिंसा पर उतारू हो गए। जब कट्टरपंथी सरकार पर भारी पड़ने लगे तो मोल्ला को लगा कि यह उसके संगठन की जीत हुई है, लेकिन कट्टरपंथियों का हुड़दंग जल्द ही उल्टा पड़ गया।
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