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क्या खस्ताहाल रेलवे की हालत में बजट के बाद होगा सुधार?

| Feb 25, 2013 at 01:27pm | Updated Feb 25, 2013 at 03:07pm

नई दिल्ली। रेल मंत्री पवन बंसल 26 फरवरी को रेल बजट पेश करेंगे, लेकिन सवाल ये है कि क्या खस्ताहाल रेलवे की हालत में रेल बजट के बाद कुछ सुधार होगा? क्या बजट में इस बार सरकार इतने धन का बंदोबस्त कर सकेगी। जिससे कि सालों से रुके हजारों करोड़ के प्रोजेक्ट एक बार फिर शुरू हो सके। फिलहाल, इसका जवाब न तो रेल मंत्री के पास है और ना ही रेलवे के आला अधिकारियों के पास। राजनीतिक फायदे और जनता की वाहवाही लूटने के लिए इन प्रोजेक्टों का ऐलान तो कर दिया गया लेकिन पैसे की कमी का हवाला देकर रेलवे ने इन पर काम शुरू करने से पहले ही हाथ खड़े कर दिए हैं।

यूपीए हो या एनडीए, पिछले डेढ़ दशक से रेलवे की लगातार खराब हो रही आर्थिक हालत को सुधारने के लिए रेल बजट में तमाम बड़ी घोषणाएं की गईं। राजनीतिक फायदे और जनता की वाहवाही लूटने के लिए करीब पौने दो लाख करोड़ के कई प्रोजेक्ट का ऐलान कर दिया गया, लेकिन इनमें से ज्यादातर प्रोजेक्ट या तो शुरू ही नहीं हुए या फिर बीच में ही रुक गए। माल ढुलाई के लिए अलग कॉरीडोर, बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट, बजट होटल जहां यात्री कम पैसों में रुक सकें, कुछ खास ट्रेनों की स्पीड को 180 किमी प्रति घंटा करना, दिल्ली समेत देश के 50 स्टेशनों को विश्वस्तरीय बनाना।

ऐसे तमाम प्रोजेक्ट का ऐलान तो बढ़ चढ़कर किया गया, लेकिन किसी सरकार ने ये योजना नहीं बनाई कि इन प्रोजेक्ट्स को पूरा कैसे किया जाए। पैसा कहां से लाया जाए। कुछ और प्रोजेक्ट की बात करें तो फल और सब्जियों के भंडारण के लिए स्टेशनों के पास कोल्ड स्टोरेज खोलना, बिहार के छपरा, मढौरा और मधेपुरा में व्हील फैक्ट्री, डीजल और इलेक्ट्रिकल लोकोमोटिव प्रोजेक्ट, ऐसे प्रोजेक्ट पर काम तो शुरू ही नहीं हुआ, यूपी की वीआईपी सीट रायबरेली के कोच कारखाने को छोड़ कर पश्चिम बंगाल और दक्षिण भारत के तमाम प्रोजेक्ट को सरकार ने हरी झंडी तो दे दी, लेकिन आज तक काम नहीं शुरू हो सका। उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में रेल लाइन बिछाने की घोषणा 6 साल पहले हुई, लेकिन भू-अधिग्रहण न हो पाने और जंगल के चलते अब तक कोई काम नहीं हुआ। पिछले पन्द्रह सालों में जितने प्रोजेक्ट की घोषणा रेल बजट में हई है उन सब को पूरा करने के लिए करीब 5 लाख करोड़ रूपये की जरूरत है।

सिर्फ छोटे-मोटे प्रोजेक्ट्स को पूरा करने के लिए रेलवे बोर्ड ने इस बार ग्रॉस बजेटरी सपोर्ट (जीबीएस) के लिए 38 हजार करोड़ रूपये मांगा है। पिछले वित्त वर्ष में रेलवे को 24 हजार करोड़ ही मिले थे।

पैसे की भारी कमी से निपटने के लिए कई प्रोजेक्ट कॉस्ट शेयर बेसिस पर शुरू किए गए हैं। हाल ही में रेल किराए में दस सालों बाद बढ़ोतरी की गई, लेकिन डीजल के बढ़े दाम की वजह से उसका कोई फायदा रेलवे को नहीं मिल सका। 2004 करोड़ के छत्तीसगढ़ और गुजरात के तीन प्रोजेक्ट को रेलवे ने मंजूरी दी है। दूसरे राज्यों ने भी इसमें इच्छा जताई है। हालांकि रेलमंत्री रुके प्रोजेक्टों के बारे में सिर्फ इतना कहते हैं कि रेलवे बोर्ड से उनकी कई बार चर्चा हुई है।

रेलवे के जानकार मानते हैं कि रेलवे की बदहाली की वजह है उसका लगातार राजनीतिक इस्तेमाल । लेकिन अब वक्त आ गया है उन प्रोजेक्ट्स को बंद करने का जिनसे रेलवे को सिर्फ नुकसान हो रहा है। जानकारों का ये भी मानना है कि रेलवे को अपने प्रोजेक्टस में पीपीपी मॉडल यानि पब्ल्कि प्राइवेट पार्टनरशिप को गंभीरता से अपनाते हुए निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ानी चाहिए। रेलवे की माली हालत किस कदर खराब है, इसका अंदाजा इस बात से भी लगता है कि रेलवे ने ग्रामीण विकास मंत्रालय को बाकायदा पत्र लिखकर उनसे छोटे मोटे कामों में मदद करने की गुहार लगाई है।

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