गुरुवार, फरवरी 19, 2009 19:24s

सर मेरा कुछ कर दीजिए........

गुजरात बीजेपी में मोदी की तूती बोलती है। यहां के बीजेपी नेताओं के राजनीतिक करियर की स्टेयरिंग मोदी के हाथों में है। इसलिए उनकी मर्जी के बिना यहां के नेता कोई कदम नहीं उठा सकते। ऐसे में वो सब लोग उनको खुश करने में लगे है जिन्हें लोकसभा का टिकट चाहिए। 2008 में लगातार तीसरी बार मुख्यमंत्री बनने के बाद मोदी को वाजपेयी और आडवाणी के कद के नेता के तौर पर देखा गया। फ़िर तो क्या था जो छवि बनी उसे मोदी और निखारते गए। इतना कम था कि नागपुर बैठक में उन्हें लोकसभा चुनाव के लिए गुजरात और महाराष्ट्र का प्रभारी बनाया गया।

मोदी ने \'नो-रिपीट\' थ्योरी का जो हथकंडा पिछले विधानसभा चुनावों में अपनाया था वही वो लोकसभा चुनाव में अपनाने जा रहे हैं। जिसने वर्तमान सांसदों की नींद हराम कर दी है। हर एक सांसद अपने आपको बेहतर उम्मीदवार के तौर पर पेश करने की कोशिश में लगा है पर उनकी दाल मोदी जी के आगे नहीं गल रही। इनदिनों विधानसभा सत्र शुरू हैं। जो सांसद संसद के सदन में दिखने चाहिए वो विधानसभा में दिख रहे हैं। मोदी के आगे मार्केटिंग में विफल रहते उनके चेहरे पर निराशा साफ़ जलकती है। निराश चेहरे से विधानसभा की लॉबी में दिखते ये सांसद फ़िर पत्रकारों को ढूंढते हैं और समझाने का प्रयास करते है कि वो बेहतर उम्मीदवार कैसे हैं। पिछले 5 सालों में उन्होंने ने क्या किया। शायद अखबार या फ़िर टीवी पर उनका रिपोर्ट कार्ड आए और शायद मोदीजी की नजर में पड़े तो उनका कुछ उद्धार हो।

सीमांकन के बाद वैसे भी कई सांसदों की जो आरक्षित सीट थी वो उनके हाथ से चली गई है। जिसके चलते मोदी की आधी मुसीबतें अपने आप ख़त्म हो गईं। बाकि जो बचे हैं वो फिलहाल मोदी के करीबी मंत्रियों की चापलूसी में पड़े हैं। पर कहा यह जा रहा है कि मोदी फिलहाल अपने मंत्रिमंडल के कुछ मंत्रियों को लोकसभा चुनाव लड़ाने जा रहे हैं जिसे सुनकर उन मंत्रियों की भी हवा निकल गई है। कई मंत्री अपने आपको गुजरात की राजनीती में महफूज मानते हैं जबकि कई मंत्री अपने से बेहतर उम्मीदवार ढूंढने में लगे हैं। इसलिए कि उनको कहीं चुनाव लड़ाया न जाए। अगर चुनाव लड़ाया जाता है और मानलो कि कहीं हार गए तो न राम मिलेगा न रहीम।

मोदी के करीबी लोगों की मानें तो इस बार कई युवा चेहरों को मोदी टिकट दिलवाने के मूड में हैं। उसके दो फायदे है एक तो नया उम्मीदवार को टिकट दिलवाने से वो मोदी भक्त रहेगा साथ में अगर सरकार बनती है तो वो सरकार में मंत्रीपद की मांग नहीं करेगा। हालांकि फिलहाल यह तो जो और तो की राजनीती है फ़िर भी अभी से सपनों की दुनिया संजोयी जा रही है।

मोदी के करीबियों के दावों को माना जाए तो मोदी इस बार 20 से ज्यादा सीट जीतकर दिलाएंगे वो भी अकेले हाथों से। गुजरात में 26 सीटें है जिसमें पिछली बार कांग्रेस ने 12 सीटें हांसिल की थी। यह जरूर है की गुजरात में मोदी चहते है पर दावों का आंकड़ा कुछ हजम नहीं होता। चूंकि कुछ ऐसे सुलगते मुद्दे है जो बीजेपी को नुकसान पहुंचा सकते हैं।

सूरत का हीरा कारबार खून के आंसू रो रहा है। जानकारों की मानें तो राज्य सरकार ने इसलिए मदद नहीं की चूंकि पिछले साल के विधानसभा चुनावों में डायमंड व्यापारियों ने मोदी के खिलाफ बगावत करने वालों को जमकर मदद की थी। मोदी नहीं चाहते कि उन बड़े व्यापारियों को किसी भी तरह की मदद की जाए। अगर यह हठाग्रह है तो इस हठाग्रह ने अबतक पचास से भी ज्यादा लोगों की जान ली है और लाखों लोगों को बेरोजगार बनाया है कई बच्चे आज पढ़ाई नहीं कर पा रहे। जो बेरोजगार हुए है उसमें ज्यादातर पटेल हैं जो सौराष्ट्र से हैं। सौराष्ट्र और सूरत के सांसद 65 हजार करोड़ के इस कारोबार के बारे में आवाज उठाने में विफल रहे हैं। ऐसे में अगर मान लो उन्हें टिकट भी मिल जाती है तो जितने के आसार फिलहाल कम दिखते हैं।

इसके आलावा कई सुलगते मुद्दे हैं जिसका खामियाजा नए उम्मीदवारों को भी भुगतना पड़ सकता है। शायद इस भय से ही वर्तमान मंत्री-विधायक लोकसभा का चुनाव लड़ने से कतरा रहे हैं। ऐसे में हार का सेहरा पहनने के डर से नए उम्मदीवार तैयार नहीं। हालांकि चुनाव मुद्दों पर लड़े जाते हैं और मोदी के बारे में कहा जाता है वो नसीब से बलवान है साथ में आपत्तियों को अवसर में तब्दील करने में माहिर हैं। ऐसे में समय रहते देखना होगा की मुद्दे की तलाश में रही बीजेपी को चुनाव जितने के लिए कोई मुद्दा ओर सही उम्मीदवार मिलते है या नहीं।

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