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तेनालीराम और चोटी का किस्सा

Updated Jan 30, 2008 at 15:26 pm IST |

 

(तेनाली राम के बारे में...
1520 ई. में दक्षिण भारत के विजयनगर राज्य में राजा कृष्णदेव राय हुआ करते थे। तेनालीराम उनके दरबार में अपने हास-परिहास से लोगों का मनोरंजन किया करते थे। उनकी खासियत थी कि गम्भीर से गम्भीर विषय को भी वह हंसते-हंसते हल कर देते थे।

उनका जन्म आंध्र प्रदेश के गुंटूर जिले के गलीपाडु नामक कस्बे में हुआ था। तेनालीराम के पिता बचपन में ही गुजर गए थे। बचपन में उनका नाम ‘राम लिंग’ था, चूंकि उनकी परवरिश अपने ननिहाल ‘तेनाली’ में हुई थी, इसलिए बाद में लोग उन्हें तेनालीराम के नाम से पुकारने लगे।

विजयनगर के राजा के पास नौकरी पाने के लिए उन्हें बहुत संघर्ष करना पड़ा। कई बार उन्हें और उनके परिवार को भूखा भी रहना पड़ा, पर उन्होंने हार नहीं मानी और कृष्णदेव राय के पास नौकरी पा ही ली। तेनालीराम की गिनती राजा कृष्णदेव राय के आठ दिग्गजों में होती है।)

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चोटी की कीमत

एक दिन बातों-बातों में राजा कृष्णदेव राय ने तेनालीराम से पूछा, ‘अच्छा, यह बताओ कि किस प्रकार के लोग सबसे अधिक मूर्ख होते हैं और किस प्रकार के सबसे अधिक सयाने?’तेनालीराम ने तुरंत उत्तर दिया, ‘महाराज! ब्राह्मण सबसे अधिक मूर्ख और व्यापारी सबसे अधिक सयाने होते हैं।’ ‘ऐसा कैसे हो सकता है?’राजा ने कहा।‘मैं यह बात साबित कर सकता हूँ’, तेनालीराम ने कहा। ‘कैसे?’राजा ने पूछा।’

‘अभी जान जाएँगे आप। जरा,राजगुरु को बुलवाइए।’राजगुरु को बुलवाया गया। तेनालीराम ने कहा,‘महाराज, अब मैं अपनी बात साबित करूँगा, लेकिन इस काम में आप दखल नहीं देंगे। आप यह वचन दें, तभी मैं काम आरंभ करूँगा।’ राजा ने तेनालीराम की बात मान ली। तेनालीराम ने आदरपूर्वक राजगुरु से कहा,‘राजगुरु जी,महाराज को आपकी चोटी की आवश्यकता है। इसके बदले आपको मुँहमांगा इनाम दिया जाएगा।’

राजगुरु को काटो तो खून नहीं। वर्षों से पाली गई प्यारी चोटी को कैसे कटवा दें? लेकिन राजा की आज्ञा कैसे टाली जा सकती थी। उसने कहा, ‘तेनालीराम जी, मैं इसे कैसे दे सकता हूँ।’‘राजगुरु जी, आपने जीवन-भर महाराज का नमक खाया है। चोटी कोई ऐसी वस्तु तो है नहीं, जो फिर न आ सके। फिर महाराज मुँहमाँगा इनाम भी दे रहे हैं।...’

राजगुरु मन ही मन समझ गया कि यह तेनालीराम की चाल है। तेनालीराम ने पूछा,‘राजगुरु जी, आपको चोटी के बदले क्या इनाम चाहिए?’ राजगुरु ने कहा, ‘पाँच स्वर्णमुद्राएँ बहुत होंगी।’पाँच स्वर्णमुद्राएँ राजगुरु को दे दी गई और नाई को बुलावाकर राजगुरु की चोटी कटवा दी गई। अब तेनालीराम ने नगर के सबसे प्रसिद्ध व्यापारी को बुलवाया। तेनालीराम ने व्यापारी से कहा, ‘महाराज को तुम्हारी चोटी की आवश्यकता है।’ ‘सब कुछ महाराज का ही तो है, जब चाहें ले लें, लेकिन बस इतना ध्यान रखें कि मैं एक गरीब आदमी हूँ।’ व्यापारी ने कहा। ‘तुम्हें तुम्हारी चोटी का मुँहमाँगा दाम दिया जाएगा।’ तेनालीराम ने कहा। ‘सब आपकी कृपा है लेकिन...।’व्यापारी ने कहा। ‘क्या कहना चाहते हो तुम।’-तेनालीराम ने पूछा। ‘जी बात यह है कि जब मैंने अपनी बेटी का विवाह किया था, तो अपनी चोटी की लाज रखने के लिए मैंने पूरी पाँच हजार स्वर्णमुद्राएँ खर्च की थीं। पिछले साल मेरे पिता की मौत हुई। तब भी इसी कारण पाँच हजार स्वर्णमुद्राओं का खर्च हुआ और अपनी इसी प्यारी-दुलारी चोटी के कारण बाजार से कम-से-कम पाँच हजार स्वर्णमुद्राओं का उधार मिल जाता है।’ अपनी चोटी पर हाथ फेरते हुए व्यापारी ने कहा।

‘इस तरह तुम्हारी चोटी का मूल्य पंद्रह हजार स्वर्णमुद्राएँ हुआ। ठीक है,यह मूल्य तुम्हें दे दिया जाएगा।’ पंद्रह हजार स्वर्णमुद्राएँ व्यापारी को दे दी गईं। व्यापारी चोटी मुँड़वाने बैठा। जैसे ही नाई ने चोटी पर उस्तरा रखा,व्यापारी कड़ककर बोला, ‘सँभलकर, नाई के बच्चे। जानता नहीं, यह महाराज कृष्णदेव राय की चोटी है।’ राजा ने सुना तो आगबबूला हो गया। इस व्यापारी की यह मजाल कि हमारा अपमान करे? उन्होंने कहा, ‘धक्के मारकर निकाल दो इस सिरफिरे को।’ व्यापारी पंद्रह हजार स्वर्णमुद्राओं की थैली को लेकर वहाँ से भाग निकला। कुछ देर बाद तेनालीराम ने कहा, ‘आपने देखा महाराज, राजगुरु ने तो पाँच स्वर्णमुद्राएँ लेकर अपनी चोटी मुँड़वा ली। व्यापारी पंद्रह हजार स्वर्णमुद्राएँ भी ले गया और चोटी भी बचा ली। आप ही कहिए, ब्राह्मण सयाना हुआ कि व्यापारी?’राजा ने कहा, ‘सचमुच तुम्हारी बात ठीक निकली।’

(साभारः तेनालीराम की मनोरंजक कहानियाँ, डायमंड प्रकाशन, सर्वाधिकार सुरक्षित।)



 

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पाठकों की राय | 30 Jan 2008

Feb 26, 2008

कहानी बहुत आकची है

kuldeep chauhan kota

Feb 16, 2008

आपकी कहानी सही लगी

sharad kumar bajaj islamnagar badaun

Feb 12, 2008

आप की कहानी मुझे पड़ने मे बहुत मज़ा आता है.

sachin rajput kannauj

Feb 11, 2008

ये वाकई मे बहुत अच्छी कहानी है.

raju bangalore

Feb 10, 2008

वास्तव मे बनिया चतुर होता है.

subhash morena(m.p.)

Feb 08, 2008

कहानी बहुत आकची हैं आज फिर भाकपान की याह ताज़ा हो गयी

amit agrawal mumbai

Feb 04, 2008

बहुत ही अच्छे कहानी हा

dheeraj manipal

Feb 02, 2008

कहानी बहुत ही अच्छी है. बच्चे आईसी ही कहानी पसंद करते है. धनवाद जोश18

naveen noida, delhi

Feb 02, 2008

यह एक साधारण लेकिन बहुत बढ़िया और शिक्षाप्र्द कहानी है.

Roshanlal Kataria INDORE

Feb 02, 2008

पुरानी कहानियाँ काफ़ी अच्छी लगती है धन्यवाद श्रीमान जी

jaipal vashist gohana

Feb 01, 2008

बहुत ही बाडिया ,पर एक ही कहानी, और भी प्रकाशित करिय ,मूज़े कहानी पड़ना बहुत पसंद हं

rea INDORE

Feb 01, 2008

काफ़ी अच्छी कहानी थी. पदके अच्छा लगा ... धन्य वाद जोश18..

satish shrivastav mumbai

Feb 01, 2008

ये एक अच्छी कहानी ह मुझे य पसंद आई मैने बचपन मे भी टेनली की कहानी पढ़ी है

preety jind

Feb 01, 2008

यह कहानी बहुत ही अच्छी है ओर सभी को व्यापारी की तरह चतुर होने की सीख देती है.

Antesh Goyal Jaipur

Jan 31, 2008

ये एक अच्छी कहानी थी. चटुराई किसी एक इंसान की मिल्कियत नही है.

AJAY Kanpur

Jan 31, 2008

यहे एकमजेदार कहानी है पड़ने से पता चलता है की क्भी भी जल्द बाज़ी से काम नही लेना चाहे ये

amit agra

Jan 30, 2008

कहानी में मज़ा नही आया. इस क से कोई सिख ना मिलती है बस पड़ने के लिए ठीक है

akshay kaumr patratu,jharkhand


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