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आपदा प्रबंधन: विनाश में करियर विकास

Updated Jun 05, 2008 at 10:58 am IST |

 

05 जून 2008
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस

नई दिल्ली।
प्रत्येक वर्ष प्राकृतिक आपदाओं से सर्वाधिक प्रभावित होने वाले देशों में भारत का दसवां स्थान है। हालांकि सूखा, बाढ़, चक्रवाती तूफानों, भूकम्प, भूस्खलन, वनों में लगनेवाली आग, ओलावृष्टि, टिड्डी दल और ज्वालामुखी फटने जैसी विभिन्न प्राकृतिक आपदाओं का पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सकता है, न ही इन्हें रोका जा सकता है लेकिन इनके प्रभाव को एक सीमा तक जरूर कम किया जा सकता है, जिससे कि जान-माल का कम से कम नुकसान हो।

क्या है आपदा प्रबंधन?

यह कार्य तभी किया जा सकता है, जब सक्षम रूप से आपदा प्रबंधन का सहयोग मिले। आपदा प्रबंधन के दो महत्वपूर्ण आंतरिक पहलू हैं। वह हैं पूर्ववर्ती और उत्तरवर्ती आपदा प्रबंधन। पूर्ववर्ती आपदा प्रबंधन को जोखिम प्रबंधन के रूप में जाना जाता है।

आपदा के खतरे जोखिम एवं शीघ्र चपेट में आनेवाली स्थितियों के मेल से उत्पन्न होते हैं। यह कारक समय और भौगोलिक – दोनों पहलुओं से बदलते रहते हैं। जोखिम प्रबंधन के तीन घटक होते हैं। इसमें खतरे की पहचान, खतरा कम करना (ह्रास) और उत्तरवर्ती आपदा प्रबंधन शामिल है।

आपदा प्रबंधन का पहला चरण है खतरों की पहचान। इस अवस्था पर प्रकृति की जानकारी तथा किसी विशिष्ट अवस्थल की विशेषताओं से संबंधित खतरे की सीमा को जानना शामिल है। साथ ही इसमें जोखिम के आंकलन से प्राप्त विशिष्ट भौतिक खतरों की प्रकृति की सूचना भी समाविष्ट है।

इसके अतिरिक्त बढ़ती आबादी के प्रभाव क्षेत्र एवं ऐसे खतरों से जुड़े माहौल से संबंधित सूचना और डाटा भी आपदा प्रबंधन का अंग है। इसमें ऐसे निर्णय लिए जा सकते हैं कि निरंतर चलनेवाली परियोजनाएं कैसे तैयार की जानी हैं और कहां पर धन का निवेश किया जाना उचित होगा, जिससे दुर्दम्य आपदाओं का सामना किया जा सके।

इस प्रकार जोखिम प्रबंधन तथा आपदा के लिए नियुक्त व्यावसायिक मिलकर जोखिम भरे क्षेत्रों के अनुमान से संबंधित कार्य करते हैं। ये व्यवसायी आपदा के पूर्वानुमान के आंकलन का प्रयास करते हैं और आवश्यक एहतियात बरतते हैं।

जनशक्ति, वित्त और अन्य आधारभूत समर्थन आपदा प्रबंधन की उप-शाखा का ही हिस्सा हैं। आपदा के बाद की स्थिति आपदा प्रबंधन का महत्वपूर्ण आधार है। जब आपदा के कारण सब कुछ अस्त-व्यस्त हो जाता है तब लोगों को स्वयं ही उजड़े जीवन को पुन: बसाना होता है तथा अपने दिन-प्रतिदिन के कार्य पुन: शुरू करने पड़ते हैं।

आपदा प्रबंधक के कार्य

आपदा प्रबंधकों को ऐसे प्रभावित क्षेत्रों में सामान्य जीवन बहाल करने का कार्य करना पड़ता है। आपदा प्रबंधन व्यावसायिक समन्वयक के रूप में कार्य करता है। यह सुनिश्चित करता है कि समस्त आवश्यक सहायक साधन और सुविधाएं सही समय पर आपदाग्रस्त क्षेत्र में उपलब्ध हैं, जिससे कम से कम नुकसान होता है।

यह प्रबंधक ऐसे विशेषज्ञ लोगों के समूह का मुखिया होता है, जिनकी सेवाएं आपदा के समय अनिवार्य होती हैं। जैसे-डॉक्टर, नर्स, सिविल इंजीनियर, दूरसंचार विशेषज्ञ, वास्तुशिल्प, इलेक्ट्रीशियन इत्यादि।

आपदा प्रबंधन की सबसे बड़ी चुनौती आपदाग्रस्त सीमा-क्षेत्र और होनेवाली क्षति का आंकलन करना है। इससे इस क्षेत्र का कार्य अत्यधिक वैज्ञानिक प्रक्रिया का रूप ले लेता है। आपदाग्रस्त क्षेत्रों की भौगोलिक एवं आर्थिक स्थितियों के कारण चुनौती और भी बढ़ जाती है।

आपदा अधिकार-क्षेत्र की तमाम सीमाएं लांघ सकती है। विपत्ति के समय अनजान कार्यों की जिम्मेदारी उठाने की आवश्यकता भी उत्पन्न होती है। ऐसी स्थिति से निपटने के लिए विशेष कर्मियों की जरूरत होती है। इससे यह कार्य और अधिक कठिन हो जाता है।

आपदा प्रबंधक कौन बन सकता है?

कोई भी व्यक्ति यह कार्य कर सकता है। हममें से प्रत्येक व्यक्ति दिन-प्रतिदिन अपने-अपने स्तर पर आपदा प्रबंधन का कार्य करता है। यदि किसी व्यक्ति के मन में जनसेवा का भाव है तो वह अत्यधिक दबाव तथा तनावपूर्ण स्थितियों में कार्य कर सकता है। उसका जोश बना रहता है तथा आपदा एवं भारी खतरे होने के बावजूद वह पूरे उत्साह से दिन भर कार्य कर सकता है, तो वह व्यक्ति प्रभावी आपदा प्रबंधक बन सकता है।

विशेष प्रशिक्षण?

गुजरात में आए भूकम्प के तत्काल बाद अधिकाधिक यह महसूस किया गया कि प्राकृतिक आपदाओं का सामना करने के लिए ऐसे लोगों की खास जरूरत है। देश में ऐसे बहुत कम संस्थान हैं जहां आपदा प्रबंधकों की क्षमता एवं आवश्यकता को महसूस किया जाता है। अधिकांश संस्थानों में आपदा प्रबंधन या इसे कम करने के लिए दूरवर्ती शिक्षा अध्ययन कार्यक्रम चलाए जाते हैं। यहां क्षेत्रीय गतिविधियों के अंतर्गत फील्ड वर्क की संभावना नहीं होता है। इसीलिए इस क्षेत्र में कार्य के दौरान या इस क्षेत्र में कार्यरत अनेक संगठनों के साथ स्वयंसेवा से ही अनुभव प्राप्त होता है।

संस्थान:

भारतीय पारिस्थितिकी एवं पर्यावरण संस्थान, नई दिल्ली एक ऐसा ही संस्थान है। यहां आपदा प्रबंधन में दो वर्ष का स्नातकोत्तर दूरवर्ती अध्ययन शिक्षा कार्यक्रम चलाया चलाया जा रहा है। इस कार्यक्रम के लिए न्यूनतम योग्यता किसी भी विषय में स्नातक की उपाधि है। कार्यक्रम में आपदा नियंत्रण जैसे मुद्दे शामिल हैं। इसमें हाइड्रोलॉजिकल, तटीय, समुद्री तथा वायुमंडल से संबंधित आपदाएं, जोखिम आंकलन तथा आपदा प्रबंधन जैसे विषय शामिल हैं।

आपदा न्यूनीकरण संस्थान अन्य संगठन है जो आपदा न्यूनीकरण, क्षमता-निर्माण तथा आपदा संबंधी तैयारी के क्षेत्र में कार्य करता है। इनका लक्ष्य कम मात्रा में उपलब्ध संसाधनों का इष्टतम उपयोग सिखाकर आपदा से शीघ्र प्रभावित होनेवाले समुदायों की संभाव्यता एवं क्षमता का निर्माण करना है। यह कार्य प्रशिक्षण, अनुसंधान एवं प्रलेखन द्वारा किया जा सकता है। वर्तमान कार्यक्रमों में प्रौद्योगिक विकास और अनुसंधान, तूफान से राहत एवं पुनर्वास कार्यकलाप, आपदा के संसाधनों से जुड़ी सूचना का एकत्रीकरण और उनका प्रसार शामिल है।

इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय ने हाल ही में आपदा प्रबंधन का प्रमाण-पत्र कार्यक्रम शुरू किया है। देश में आपदा की गहनता में वृद्धि तथा अंतराल में होनेवाली कमी को ध्यान में रखते हुए छह माह का पाठ्यक्रम तैयार किया गया है। इस कार्यक्रम में आपदा चक्र की अवस्थाएं, महाविपत्तियों का सामना करने की विधियां तथा आपदा के बारे में जनचेतना के प्रसार के तरीके शामिल हैं।

इस पाठ्यक्रम के लिए विद्यार्थी के पास इंटरमीडिएट की डिग्री होनी चाहिए।

सन् 1987 में भोपाल गैस त्रासदी के बाद आपदा प्रबंधन संस्थान (डीएमआई) की स्थापना की गई। यहां खतरनाक तत्वों के प्रबंधन, जोखिम विश्लेषण, स्थल पर तथा स्थल से बाहर आपात स्थितियों की योजना बनाने एवं प्राकृतिक आपदाओं के प्रबंधन से संबंधित प्रशिक्षण पाठ्यक्रम चलाए जाते हैं। गैर-सरकारी संगठन, विश्व स्वास्थ्य संगठन, विश्व बैंक और रेडक्रॉस जैसे संगठनों में आपदा प्रबंधकों को रोजगार मिल सकता है।

रेडक्रॉस नियमित या परियोजना के आधार पर विभिन्न आपदाजनक स्थितियों को सम्भालने के लिए तकनीकी और लोकोपकारी प्रशिक्षण देता है। केंद्रीय सरकार के वेतनमान के अनुसार वेतन दिया जाता है। रेडक्रॉस अपने कर्मचारियों तथा स्वयंसेवियों को आपदाग्रस्त क्षेत्रों में जाने व ठहरने के लिए खर्चे का भुगतान करता है।

 

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पाठकों की राय | 05 Jun 2008


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