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जड़ी-बूटियों के लिए भी प्रसिद्ध है पन्ना

Updated Dec 23, 2008 at 14:37 pm IST |

 

23 दिसम्बर 2008
वार्ता

पन्ना।
मध्यप्रदेश के बुंदेलखण्ड क्षेत्र का पन्ना जिला बेशकीमती रत्न हीरे के लिए ही नहीं बल्कि प्रचुर संख्या में दुर्लभ जड़ी बूटियों के लिए भी जाना जाता है।

जिले में सारंग मंदिर की पहाड़ि‍यों से लेकर कालिंजर तक वनौषधियों का अकूत भण्डार है। जिले के दक्षिण में आदिवासी बहुल कल्दा पठार पवई और शहनगर दो विकासखण्डों के सीमा को घेरता है। यहां के समृद्ध वन क्षेत्र में प्राकृतिक रूप से प्रचुर मात्रा में दुर्लभ जड़ी-बूटियां पाई जाती हैं।

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जानकारों का कहना है कि कल्दा पठार के जंगल में पाई जाने वाली दुर्लभ वनौषधियों की तासीर हिमालय क्षेत्र में पाई जाने वाली जड़ी-बूटियों से मिलती-जुलती हैं।

उल्लेखनीय है कि बेशकीमती रत्न हीरों की उपलब्धता के लिए प्रसिद्ध पन्ना जिले को प्रकृति ने वनौषधियों तथा अन्य वनोपजों से भी समृद्ध किया है लेकिन वनों की हो रही अनियंत्रित कटाई तथा अवैज्ञानिक तरीके से वनोपज के दोहन से जिले की प्राकृतिक सम्पदा धीरे-धीरे खत्म हो रही है।

दुर्लभ वनौषधियों की अनेक प्रजातियों के विलुप्त हो जाने पर वन विभाग का ध्यान अब इस ओर गया है और वनौषधियों के संरक्षण व संवर्धन की दिशा में प्रयास शुरू किए गए हैं। पन्ना की सामाजिक वानिकी ने जिला मुख्यालय के निकट पहाड़ी पर लगभग 15 हेक्टेयर क्षेत्र में औषधीय पौधों का रोपण कराया है।

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वन परिक्षेत्राधिकारी एम.के.शर्मा ने बताया कि इस पहाड़ी में दुर्लभ किस्म के औषधीय पौधों तथा जड़ी-बूटियों का रोपण किया गया है जिससे आम जनता में भी वन औषधियों के प्रति अभिरूचि पैदा हुई है।

संजीवनी औषधि केन्द्र पन्ना के वैद्य राय राघवेन्द्र सिंह ने बताया कि कल्दा पठार के जंगल में खनिज तथा वन सम्पदा की भरमार है। यहां चिरौंजी, आंवला, महुआ, तेंदू,  हर्रा, बहेरा, शहद तथा तेंदूपत्ता जैसी वनोपज प्रचुर मात्रा में पाई जाती हैं। इस पठार में दुर्लभ वनौषधियों का भी खजाना है।

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विकास की रोशनी से दूर पठार के आदिवासी गरीबी में भी प्रफुल्लित और आनंदित जीवन जीते हैं। इस पठार के गांव में 80.85 वर्ष की उम्र वाले कई बुजुर्ग मिल जाएंगे, जिन्होंने अपनी जिंदगी में कभी अस्पताल का मुंह नहीं देखा। यहां की आबोहवा ही ऐसी है कि आमतौर पर कोई बीमार नहीं पड़ता और यदि बीमार हुआ तो जड़ी-बूटियों को उपयोग करके बीमारी से मुक्त हो जाता है।

यहां के जंगल में सफेद मूसली, खस, महुआ, गुठली, हर्रा, बहेरा, काली मूसली, शतावर, मुश्कदाना, लेमर ग्रास, कलिहारी, अश्वगंधा, सर्पगंधा, माल कांगनी, चिरोटा, लटजीरा, अर्जुन दाल, मेलमा, ब्राम्ही, बिहारी कंद, मुलहटी, शंख पुष्पी, सहदेवी, पुनर्ववा, धवई, हर सिंगार, भटकटइया, कालमेघ, जंगली प्याज, केवल कंद, तीखुर तथा नागरमोथा जैसी वनौषधियां प्रचुर मात्रा में पाई जाती हैं।

 

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