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गुलाब का फूल

Updated Jun 29, 2009 at 16:32 pm IST |

 

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तेनाली राम के बारे मे:

1520 ई. में दक्षिण भारत के विजयनगर राज्य में राजा कृष्णदेव राय हुआ करते थे। तेनाली राम उनके दरबार में अपने हास-परिहास से लोगों का मनोरंजन किया करते थे। उनकी खासियत थी कि गम्भीर से गम्भीर विषय को भी वह हंसते-हंसते हल कर देते थे।

उनका जन्म गुंटूर जिले के गलीपाडु नामक कस्बे में हुआ था। तेनाली राम के पिता बचपन में ही गुजर गए थे। बचपन में उनका नाम ‘राम लिंग’ था, चूंकि उनकी परवरिश अपने ननिहाल ‘तेनाली’ में हुई थी, इसलिए बाद में लोग उन्हें तेनाली राम के नाम से पुकारने लगे।

विजयनगर के राजा के पास नौकरी पाने के लिए उन्हें बहुत संघर्ष करना पड़ा। कई बार उन्हें और उनके परिवार को भूखा भी रहना पड़ा, पर उन्होंने हार नहीं मानी और कृष्णदेव राय के पास नौकरी पा ही ली। तेनाली राम की गिनती राजा कृष्णदेव राय के आठ दिग्गजों में होती है।


गुलाब का फूल

तेनाली राम की पत्नी को गुलाब के फूलों का बहुत शौक था। वह तेनाली राम से चोरी-चोरी अपने बेटे को राजा के बाग में भेजा करती। वह वहां से एक गुलाब का फूल तोड़ लाता, जिसे तेनाली राम की पत्नी अपने बालों में लगा लिया करती।
दरबार में तेनाली राम के कई शत्रु थे। उन्हें किसी तरह यह बात पता चल गई, लेकिन राजा से कहने का साहस उनमें नहीं था। वह जानते थे कि तेनाली राम अपनी सूझबूझ के बल पर अपने बेटे को बचा लेगा और उन्हें बेवकूफ बनना पड़ेगा।

उन्होंने सोचा कि तेनाली राम के बेटे को रंगे हाथों पकड़ना चाहिए। एक दिन उन्हें अपने जासूसों से पता चला कि तेनाली राम का बेटा फूल तोड़ने के लिए बगीचे में आया हुआ है। फिर क्या था, उन्होंने राजा से शिकायत की ओर कहा, “महाराज, हम अभी उस चोर को आपके सामने उपस्थित करेंगे।”

वे लोग बगीचे के मुख्य द्वार पर जाकर खड़े हो गए। बाग के दूसरे सभी द्वारों पर भी आदमी खड़े कर दिए गए। उन्हें तेनाली राम के बेटे के पकड़े जाने का इतना यकीन था कि वे तेनाली राम को भी अपने साथ ले गए थे। उन्होंने बड़ा रस ले लेकर तेनाली राम को बताया कि अभी उसका बेटा रंगे हाथों पकड़ा जाएगा और उसे राजा के सामने पेश किया जाएगा। उनमें से एक बोला, “कहो तेनाली राम अब तुम्हें क्या कहना है?”

“मुझे क्या कहना है?” तेनाली राम ने चिल्लाते हुए कहा, “मेरे बेटे के पास अपनी बात कहने के लिए जबान है। वह स्वयं ही जो कहना होगा, कह लेगा। मेरा अपना विचार तो यह है कि वह अवश्य मेरी पत्नी की दवा के लिए जड़ें लेने गया होगा, गुलाब का फूल लेने नहीं।”

तेनाली राम के बेटे ने बगीचे के अंदर ये शब्द सुन लिए, जिन्हें तेनाली राम ने उसे सुनाने के लिए ही ऊंची आवाज में कहा था। वह अपने पिता की बात का मतलब समझ गया। उसने झट से गुलाब का फूल मुंह में डाल लिया और उसे खा गया। फिर उसने बाग में से कुछ जड़ें इकट्ठी की ओर उन्हें झोली में डालकर बाग के द्वार तक पहुंचा। तेनाली राम के शत्रु दरबारियों ने उसे एकदम पकड़ लिया और उसे राजा के पास ले गए।

“महाराज, इसने अपनी झोली में आपके बाग से चुराए गए गुलाब के फूल छिपा रखे हैं।” दरबारियों ने कहा। “गुलाब के फूल, कैसे गुलाब के फूल?” तेनालीराम के बेटे ने कहा, “ये तो मेरी मां की दवा के लिए जड़ें हैं।” उसने झोली खोलकर जड़ें दिखा दीं। दरबारियों के सिर शर्म से झुक गए। राजा ने तेनाली राम से क्षमा मांगी और उसके बेटे को बहुत-सी भेंट देकर घर भेज दिया।

(साभारः तेनालीराम की सूझबूझ, डायमंड प्रकाशन, सर्वाधिकार सुरक्षित।)

 

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पाठकों की राय | 29 Jun 2009


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