21 अक्टूबर 2014

न्यूजलैटर सब्सक्राइब करें

CLOSE

Sign Up


“भारतीय इतिहास का एक दुखद काल था ‘आपातकाल’”

Updated Jun 26, 2010 at 15:14 pm IST |

 

26 जून 2010
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस
जार्ज जोसेफ

(आपातकाल की 35वीं बरसी, 25 जून पर विशेष)


नई दिल्ली। चर्चित पत्रकार और मानवाधिकार कार्यकर्ता कुलदीप नैयर का कहना है कि आपातकाल भारतीय इतिहास का एक दुखद काल था, जब हमारी आजादी लगभग छिन-सी गई थी। नैयर ने कहा कि आपातकाल आज भी अनौपचारिक रूप से देश में अलग-अलग रूपों में मौजूद है, क्योंकि शासक वर्ग नौकरशाही, पुलिस और अन्य वर्गों के पूर्ण सहयोग से अधिनायकवादी और लोकतंत्रविरोधी गतिविधियों में लिप्त है।

नैयर ने आपातकाल की घोषणा की 35वीं बरसी पर ‘आईएएनएस’ के साथ एक साक्षात्कार में कहा, "इंदिरा गांधी के आपातकाल लागू करने से सबसे बड़ा नुकसान यह हुआ था कि राजनीति और अन्य लोकतांत्रिक संस्थानों में नैतिक मूल्यों का क्षरण हो गया था। उस रुझान में आज तक बदलाव नहीं आ पाया है।"

इमरजेंसी के दौरान हुई मौतों की जांच की मांग

नैयर स्वयं आपातकाल के दौरान तीन महीने तक जेल में कैद रहे। उन दिनों नागरिक अधिकारों को निलंबित कर दिया गया था। राजनीतिक विरोधियों को जेल में ठूंस दिया गया था और प्रेस पर प्रतिबंध लागू कर दिया गया था।

नैयर ने कहा, "अधिनायकवादी शासकों द्वारा कई राज्यों और संस्थानों में अनौपचारिक आपातकाल आज भी लागू है। कई राज्यों में जिस तरीके से आपातकाल लागू है, वहां के मुख्यमंत्री नौकरशाही और पुलिस की मदद से अलोकतांत्रिक गतिविधियों में लिप्त हैं।"

नैयर ने कहा, "आपातकाल के सात वर्षों बाद हमने भोपाल में एक पुलिस अधीक्षक को देखा, जिसने गैस त्रासदी के एक मुख्य आरोपी (वॉरेन एंडरसन) को गिरफ्तार किया था। लेकिन फिर उसी ने उसे रिहा कर दिया और एक वीआईपी विमान में उसे बैठा कर रवाना कर दिया। ऐसा ऊपर से आए किसी निर्देश पर ही हो सकता है।"

ज्ञात हो कि नैयर ब्रिटेन में भारतीय उच्चायुक्त के रूप में भी काम कर चुके हैं। उन्होंने कहा कि आपातकाल के पूर्व भ्रष्टाचार निरोधी आंदोलन के दौरान जनता की आवाज तेज सुनाई दी थी।

नैयर ने कहा, "इस कारण प्रशासन ने आपातकाल के दौरान राजनीतिक और गैरराजनीतिक, दोनों तरह के लाखों कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया। हालांकि लोकतंत्र की भावना फिर भी नहीं मर पाई।"

आपातकाल फिर लगना चाहिए-लालू

25 जून, 1975 को याद करते हुए नैयर कहते हैं, "वह एक काल रात्रि थी, जब मुश्किल से हासिल की गई हमारी आजादी लगभग छिन गई थी। इंदिरा गांधी कानून के ऊपर हो गई थीं। प्रेस का गला घोट दिया गया था। राजनीतिक नेताओं से लेकर सामान्य जनता तक, एक लाख लोगों को बिना किसी आरोप के हिरासत में ले लिया गया था। श्रीमती गांधी और उनके बेटे संजय गांधी के उस कदम से अधिनायकवादी और संविधानेतर शासन के एक अध्याय की शुरूआत हो गई।"

लोकतंत्र के प्रमुख स्तंभों का निर्माण करनेवाले राजनेता, नौकरशाह, मीडियाकर्मी और यहां तक कि न्यायाधीश भी तत्कालीन सरकार के अधिनायकवादी और अनधिकृत कदमों पर सवाल खड़ा नहीं करते थे। नैयर ने कहा, "यह चकित करनेवाला था। आपातकाल की घोषणा ने भय का माहौल पैदा कर दिया था, जिसने लोगों को और संस्थानों को अपनी गिरफ्त में ले लिया था।"
नैयर याद करते हुए कहते हैं कि ज्यादातर नौकरशाह आंखें मूंदकर श्रीमती गांधी और उनके बेटे के अलोकतांत्रिक आदेशों का पालन करते थे।

नैयर ने कहा, "इन अधिकारियों से कुछ नैतिक आधार और पारंपरिक मूल्यों की उम्मीद थी। लेकिन वे सभी नतमस्तक हो गए थे। दंडाधिकारी फटाफट ब्लैक वारंट जारी कर रहे थे। पुलिस, प्रशासन के आदेश का पालन करने को तत्पर थी और उसने नागरिकों के मौलिक अधिकारों को दरकिनार कर दिया था।"

नैयर ने आगे कहा, "यहां तक कि न्यायपालिका ने भी उम्मीदों पर पानी फेर दिया था। बंदी प्रत्यक्षीकरण अधिकार से संबंधित चर्चित मामले में, तत्कालीन महान्यायवादी नीरेन दा ने कहा था कि यदि किसी को गोली मार दी गई या वह गायब हो गया तो उसके आश्रितों को सवाल करने का अधिकार नहीं होगा। फैसले में केवल एकमात्र न्यायाधीश न्यायमूर्ति एच.आर.खन्ना ने नागरिक अधिकारों का समर्थन किया था। बाकी पांच अन्य न्यायाधीशों ने, जिनमें कि भारतीय न्यायपालिका के शीर्ष नाम शामिल थे, नागरिक अधिकारों से संबंधित याचिकाओं का समर्थन नहीं किया।"

श्रीमती इंदिरा गांधी से कुछ सीखेंगे आडवाणी जी?


नैयर ने कहा कि मीडियाकर्मी आपातकाल के आगे अपने रुख पर कायम नहीं रह सके। नई दिल्ली के प्रेस क्लब में प्रेस पर प्रतिबंध की निंदा करने के लिए 28 जून को बुलाई गई बैठक में 103 पत्रकारों ने हिस्सा लिया था।

नैयर याद करते हुए कहते हैं, "कुछ दिनों बाद मुझे गिरफ्तार कर लिया गया, क्योंकि मैंने राष्ट्रपति और अन्य अधिकारियों को मीडिया की भावना से अवगत कराते हुए पत्र लिखा था। लेकिन जब मैं तीन महीने बाद तिहाड़ जेल से घर लौटा तो मैंने पाया कि मीडिया का पूरा रुख बदल चुका था।"

 

यह खबर आपको कैसी लगी

10 में से 2 वोट मिले

पाठकों की राय | 26 Jun 2010

Oct 30, 2011

कुछ लोग नैएर जी ग़लत कहते है कुछ सही कहते है लेकिन मेरा मानना है की हर जगह परिस्थितिया अलग अलग होती है/ जब आपातकाल लगा था उस वक्त हालत जरूर कुछ ठीक नही थे लेकिन आपातकाल का मौलिक उदेश्य उनकी अपनी सत्ता थी/ अगर हम इतिहास के पन्नो को सही से पड़े तो पता चलता की सही क्या है वरना यू ही कुछ नई बोलना चाहिए / जब हम राजनीति की बात करते है तो तमाम लोग राजनीति के लिए ग़लत शब्दो का प्रयोग करते हुए उसको खराब बता देते है लेकिन उस्मे जा कर कोई उसको साफ नही करना चाहता और जो जाते है वो इसको साफ करने के बारे मे

hemlarta sharma shahjahanpur

Nov 21, 2010

हमारे देश मे यही कमी हे यहा आचे लोगो की इज़्ज़त न्ही होती संजय गाँधी आज यहा होते तो यह देश आज पूरे विश्व पर राज करता जनसख्या की समस्या आतंकवादी जेसी घ्टना कभी पेड़ा न होती यदि एसा होता तो नेता को घुस कहा से मिलती सबसे बड़ा आतकी नेता हे जो कोई भी इमानदर को मरवा देता हे आब भी ना समझे तो फिर गुलामी मिलेगी

manish pathak ashta

Jun 29, 2010

आपातकाल  मे संजय गांधी ने पांच सूत्री कार्यक्रम दिया था जिसमें जनसंखया नियंत्रण, पेडॅ- लगाने, दफतरों में अनुशासन की पाबंदी और समय का पालन करने जैसी बाते थीं। आज से लगभग तीस पहले ये बातें कहने पर उसकी खिल्ली उडाई गई थी लेकिन आज भारत की हालत देखो. बढती जनसंखयाम, कटते पेड, अनुशासनहीनता और समय की पाबंदी नही ंमानने के कारण पूरी दुनिया में हमे हेय दृष्टि से देखा जाता है, तब की जनता पार्टी के नेता अब भी टुकड-ओं में लड रहे हैं, भारत का क्या भला किया उन्होंने

inderdhari singh mumbai

Jun 28, 2010

नैयर जी को शर्म आनी चाहिए. उस समय सब ठीक था काबाजारी नही थी सरकारी कर्मचारी समय से आता था और काम होता था. चोरी चाकरी बंद हो गई थी.आज क्या है लोकतंतरा के नाम पर गुंडाराज. भ्रास्ट्रचार चारो और फैला है. क़ानून नाम की कोई चीज़ ही नहीं है कोई भी किसी को कत्ल कर देता . आम आदमी की जिंदगी बहुत सस्ती हो गई है न्याय पाने के लिए २५ साल लग जाते है बड़े शर्म की बात है नैयर जी को यह  पसंद है. यहाँ के सांसद अपनी तुलना अमेरिका नेता से करते की उनको भी उतनी सुविधा मिलनी चाहिए लेकिन यहाँ के नेता काम क्या करते?

jagdish prasad kanpur

Jun 28, 2010

Yudhh me senapati ki ran neet aur jab desh men ashanti ka daur hoto desh nayak- raja- ya desh ka pradhanmantri durgami soch se desh ko tutne se bachale wah bahadur mana jata hai, us samay ki prashthiti ke mutabik desh ki pradhanmantri ne sahi kiya tha, is sacchai ko nakarna desh drohita mana jasakta hai,-----------------------dr.Bharat cfib, ludhiana

DR.BHARAT CFIB. LUDHIANA

Jun 26, 2010

नैयर लगता है तुम को भारत मे धमाके आतंकी घटना देखने और सुन ने मे मज़ा आता है,,जिस समय आपातकाल लगा था उस समय देश की इंदिरा जी की सोच को ग़लत ठहरा ने वाला आतंक वाडी ही हो सकता है,,इंदिरा जी हमारे ई दौर मे होती तो संभवत हमे इस तरह का आतंकी का सिकार नई बनता भारत,आज यदि संजय और इंदिरा जी जीवित होते तो हर भारतीय शांति से रह रहा होता लेकिन आज हम अपनी मात्र भूमि मे अपनो को ही जलते देखकर भी कुछ नही करते कारण है तुम जैसे गद्दार,,नैयर

Dr.shyam pandey sydney australia


कृपया ध्यान रखें: अपनी राय देते समय किसी प्रकार के अभद्र शब्द, भाषा का इस्तेमाल न करें। अभद्र शब्दों का इस्तेमाल आपको इस साइट पर राय देने से प्रतिबंधित किए जाने का कारण बन सकता है। सभी टिप्पणियां समुचित जांच के बाद प्रकशित की जाएंगी।
नाम
शहर
इमेल

आज के वीडियो

प्रमुख ख़बरें

Live TV  |  Stock Market India  |  IBNLive News  |  Cricket News  |  In.com  |  Latest Movie Songs  |  Latest Videos  |  Play Online Games  |  Rss Feed  |  हमारे बारे में  |  हमारा पता  |  हमें बताइए  |  विज्ञापन  |  अस्वीकरण  |  गोपनीयता  |  शर्तें  |  साइट जानकारी
© 2011, Web18 Software Services Ltd. All Rights Reserved.